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वाजपेयी बनाम मोदी: पोटा, यूएपीए, कारगिल से अग्निवीर तक, राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीति के कड़े दांव का जमीनी विश्लेषण

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✍️  स्पेशल स्टोरी / खास रपट
    आर आर यादव

पार्ट 2: सरहद के जोखिम, कड़े कानून और नागरिक स्वतंत्रताओं पर दबाव

राष्ट्रीय सुरक्षा, आंतरिक विधि-व्यवस्था और विदेश नीति के संवेदनशील मोर्चे पर वाजपेयी और मोदी सरकारों के निर्णयों ने देश की संप्रभुता, वित्तीय संसाधनों और लोकतांत्रिक संस्थाओं को समान रूप से कड़े इम्तिहान में डाला। वाजपेयी के दौर में जहां कूटनीतिक संयम और शांति वार्ताओं के बदले सरहद पर खुफिया विफलताएं और गंभीर सैन्य संकट झेलने पड़े, वहीं मोदी के दौर में आक्रामक राष्ट्रवाद, कठोर कानूनी संशोधनों और केंद्रीय जांच एजेंसियों के आक्रामक इस्तेमाल ने आंतरिक शांति, नागरिक स्वतंत्रताओं और क्षेत्रीय प्रभाव को गहरे दबाव में ला खड़ा किया।

पोटा से यूएपीए तक: नागरिक अधिकारों का संकुचन

कानून-व्यवस्था और असहमति की आवाजों को नियंत्रित करने के मामले में दोनों ही सरकारों ने असाधारण रूप से कठोर कानूनी रास्ते चुने। वाजपेयी सरकार ने 2001 के संसद आतंकी हमले के बाद आतंकवाद रोकथाम कानून (पोटा) को संसद के संयुक्त सत्र के जरिए पारित कराया। इस कानून के तहत बिना औपचारिक आरोप-पत्र के लंबे समय तक हिरासत में रखने के प्रावधानों का दुरुपयोग विपक्षी नेताओं और अल्पसंख्यक युवाओं के कथित उत्पीड़न में हुआ, जिसके व्यापक विरोध के चलते 2004 में सत्ता परिवर्तन होते ही इसे निरस्त करना पड़ा।

मोदी सरकार ने इस दंडात्मक व्यवस्था को और अधिक व्यापक व सख्त बना दिया। गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (यूएपीए) में संशोधन करके यह प्रावधान किया गया कि अदालत में आरोप साबित होने से पहले भी सरकार किसी भी व्यक्ति को व्यक्तिगत स्तर पर आतंकवादी घोषित कर सकती है। इसके साथ ही औपनिवेशिक कानूनों के स्थान पर लाई गई भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों के अभूतपूर्व इस्तेमाल ने नागरिक अधिकारों को संकुचित किया। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और प्रमुख विपक्षी नेताओं को बिना जमानत वर्षों तक सलाखों के पीछे रखने की घटनाओं ने यह गंभीर संदेश दिया कि आपराधिक जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए किया जा रहा है।

कारगिल का खामियाजा बनाम अग्निवीर का आक्रोश

सीमा सुरक्षा और सैन्य फैसलों के स्तर पर लिए गए साहसिक कदमों ने देश के खजाने और युवाओं के भविष्य को समान रूप से दांव पर लगाया। वाजपेयी ने 1998 में पोखरण-2 परमाणु परीक्षण कर भारत को वैश्विक परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित तो किया, लेकिन इसके बदले देश को भारी अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों, विदेशी निवेश में ठहराव और वित्तीय दबावों की मार झेलनी पड़ी। इसके तुरंत बाद 1999 में कारगिल की सामरिक चोटियों पर पाकिस्तानी घुसपैठ को पकड़ने में खुफिया तंत्र की विफलता के कारण सैकड़ों जांबाज जवानों को अपनी शहादत देकर सीमा खाली करानी पड़ी।

संसद हमले के बाद सीमा पर करीब 10 महीने तक लाखों सैनिकों की तैनाती वाले ‘ऑपरेशन पराक्रम’ में हजारों करोड़ रुपये स्वाहा हुए, जिसमें बिना कोई सीधा युद्ध लड़े माइंस बिछाने और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण सैकड़ों सैनिकों ने जान गंवाई। वहीं, 1999 में कांधार विमान अपहरण के समय दुर्दांत आतंकियों को मुक्त करने का फैसला सुरक्षा तंत्र की सबसे बड़ी मजबूरी और रणनीतिक असफलता माना गया।

इसके विपरीत, मोदी सरकार ने उरी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा के बाद बालाकोट एयर स्ट्राइक कर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ ‘घर में घुसकर मारने’ का नया सामरिक सिद्धांत गढ़ा। हालांकि इस दौरान दोनों परमाणु संपन्न पड़ोसियों के बीच सीधे युद्ध का गंभीर खतरा मंडराया और भारत का एक लड़ाकू विमान भी गिरा। अमेरिका की धमकी के आगे मोदी सरकार ने घुटने टेक दिए और सीजफायर की घोषणा कर दी।

सुरक्षा क्षेत्र में मोदी सरकार का सबसे विवादास्पद निर्णय सेना भर्ती में ‘अग्निवीर’ योजना का क्रियान्वयन रहा, जिसने ग्रामीण और अर्ध-शहरी युवाओं से स्थायी सेवा, पेंशन और सुरक्षित भविष्य छीनकर देश भर में भीषण छात्र असंतोष पैदा किया।

इसके अलावा, 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद पूर्वी लद्दाख सीमा पर चीन के साथ डिसएंगेजमेंट वार्ताओं के तहत बने ‘बफर जोन’ के कारण भारत के पारंपरिक गश्ती अधिकारों के सीमित होने पर गंभीर रणनीतिक चिंताएं खड़ी हुईं। वहीं, पूर्वोत्तर के संवेदनशील सीमावर्ती राज्य मणिपुर में महीनों तक खिंची भीषण जातीय हिंसा पर केंद्र सरकार की निष्क्रियता ने आंतरिक सुरक्षा प्रबंधन की अक्षमता को उजागर किया।

कूटनीतिक प्रयोग और पड़ोस में सिकुड़ता प्रभाव

विदेश नीति के कैनवास पर दोनों प्रधानमंत्रियों की कार्यशैली एक-दूसरे के विपरीत नजर आई। वाजपेयी ने लाहौर बस यात्रा और आगरा शिखर सम्मेलन जैसे कूटनीतिक जोखिम उठाए, लेकिन उनका प्रतिफल कारगिल युद्ध और संसद पर हमले के धोखे के रूप में सामने आया, जिसे वाजपेयी का कूटनीतिक भोलापन कहा गया। हालांकि करगिल संकट के दौरान अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के संयमित रुख के चलते अमेरिका ने पहली बार पाकिस्तान को नियंत्रण रेखा से सेना हटाने के लिए सीधे तौर पर विवश किया।

दूसरी ओर, मोदी सरकार ने बहु-ध्रुवीय कूटनीति अपनाते हुए रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव को खारिज कर भारी मात्रा में रियायती रूसी कच्चा तेल खरीदा और जी20 के मंच से ‘ग्लोबल साउथ’ की मुखर आवाज बनी। इसके बावजूद ‘पड़ोस प्रथम’ (नेबरहुड फर्स्ट) का दावा दक्षिण एशिया में कमजोर पड़ता दिखा। नेपाल, मालदीव, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे पारंपरिक रूप से भारत पर निर्भर पड़ोसियों में चीनी दखल का विस्तार हुआ और स्थानीय स्तर पर भारत-विरोधी राजनीतिक भावनाओं को हवा मिली।
साथ ही, पश्चिमी देशों विशेषकर कनाडा और अमेरिका के साथ खालिस्तानी मामलों को लेकर उपजे राजनयिक विवादों ने भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा के सामने नई चुनौतियां खड़ी कीं। भाजपानीत दोनों सरकारों का यह समग्र लेखा-जोखा प्रमाणित करता है कि जहां वाजपेयी के फैसलों ने सुरक्षा विफलता और पेंशन छिनने का दर्द दिया, वहीं मोदी के आक्रामक केंद्रीकरण ने अनियोजित घोषणाओं, सैन्य भर्ती की असुरक्षा और नागरिक अधिकारों के संकुचन की ऐसी गहरी चोट दी जिसका असर देश का आम नागरिक आज भी महसूस कर रहा है।

 


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