2,396 अभियोजन शिकायतें और 466 में ही आरोप तय
1,278 मामले चुपचाप बंद
न्यायिक नतीजों के नाम पर विशाल मशीनरी बेअसर
जांच का हिसाब मांगने पर कटघरे में गृह मंत्रालय
✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई | भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ के भारी-भरकम सरकारी दावों और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ताबड़तोड़ कार्यवाहियों के शोर के बीच खुद संसद में पेश आधिकारिक आंकड़ों ने केंद्र की भाजपा सरकार और केंद्रीय गृह मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष को घेरने के लिए जांच एजेंसियों के कथित इस्तेमाल के आरोपों के बीच वास्तविकता यह है कि ED के दर्ज हजारों मुकदमों में से अदालत में अंतिम फैसले तक पहुंचने वाले मामलों की संख्या बेहद निराशाजनक है।
संसद और आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, 31 मार्च 2026 तक धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत कुल 8,851 ECIR (Enforcement Case Information Reports ) दर्ज की गईं। इनमें से 2,396 मामलों में अदालतों में अभियोजन शिकायतें (चार्जशीट) दाखिल की गईं, लेकिन आरोप केवल 466 मामलों में ही तय हो सके। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि वर्षों की जांच के बाद पूरे देश में सिर्फ 60 मामलों का ही ट्रायल पूरा हो पाया। इनमें से 56 मामलों में दोषसिद्धि और 4 में बरी होने का रिकॉर्ड है।
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सरकार अक्सर ED की 93.33% (और दिसंबर 2025 तक 58 में से 55 फैसलों के आधार पर 94.82%) कनविक्शन रेट का ढिंढोरा पीटती है, लेकिन यह सफलता कुल 8,851 मामलों की नहीं, बल्कि केवल उन 60 मुकदमों की है जिनका ट्रायल पूरा हो सका। कुल दर्ज केसों के अनुपात में देखें तो अंतिम न्याय तक पहुंचने का यह आंकड़ा 1 प्रतिशत से भी कम ठहरता है।
विपक्ष इसे गृह मंत्री अमित शाह और मोदी सरकार की प्रशासनिक नाकामी करार दे रहा है। आरोप है कि जांच एजेंसियों की प्राथमिक ऊर्जा अदालती दोषसिद्धि के बजाय राजनीतिक दबाव बनाने, हेडलाइन मैनेजमेंट और मुकदमों को वर्षों लटकाए रखने में खर्च हो रही है। आंकड़े बताते हैं कि 1,278 मामले तो बिना किसी नतीजे के बंद (क्लोज) कर दिए गए, जिनमें 1 अगस्त 2019 के बाद ही 93 क्लोजर रिपोर्ट दाखिल हुईं।
यही नहीं, ED ने 2.36 लाख करोड़ रुपए से अधिक की संपत्तियों के अनंतिम कुर्की आदेश जारी किए, 65,872 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्तियों से आरोपियों को बेदखल किया और 63,142 करोड़ रुपए की राशि लौटाने का दावा किया, लेकिन कानूनी रूप से मामलों को मुकाम तक पहुंचाने में जांच मशीनरी की सुस्ती साफ दिखती है।
आंकड़े साफ गवाही दे रहे हैं कि एजेंसी का पूरा ध्यान मामले दर्ज करने, कुर्की के आदेश जारी करने और राजनीतिक माहौल गरमाने तक ही सीमित है; तार्किक और न्यायिक अंत तक केस को ले जाने में एजेंसी पूरी तरह हांफ चुकी है।
