मोदी सरकार पर सोनिया गांधी का सीधा प्रहार
आपातकाल के बचाव में बोलीं- ‘बिगड़ते हालात से लड़ रही थीं इंदिरा’
✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई | नई दिल्ली | केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के 12 वर्षों के शासनकाल को देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए ‘घातक’ करार देते हुए कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी ने तीखा राजनीतिक हमला किया है। अपनी आगामी पुस्तक ‘बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ के विमोचन से पहले दिए एक साक्षात्कार में सोनिया गांधी ने साफ कहा कि पिछले एक दशक से अधिक समय में संवैधानिक संस्थाओं और सामाजिक ताने-बाने को इस कदर खोखला कर दिया गया है कि भविष्य में सत्ता परिवर्तन के बाद भी व्यवस्था की बहाली आसान नहीं होगी।
देश की चुनावी व्यवस्था पर सीधा हमला बोलते हुए सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि सत्तापक्ष ने विपक्ष के लिए मुकाबले की हर संभावना को कुंद कर दिया है और हाल के दौर में ‘कई चुनावों की बाकायदा चोरी’ की गई है। ‘जनादेश पर डाका डालकर कई चुनाव चुराए’ गए।
चुनावी शुचिता और संस्थागत स्वतंत्रता पर उठते सवालों के बीच सोनिया गांधी ने दावा किया कि सत्ता प्रतिष्ठान ने चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्थाओं पर पूरी तरह शिकंजा कस लिया है। मुख्यधारा के मीडिया पर सरकारी दबाव, अथाह धनबल और चुनावी लाभ के लिए धर्म के खुले इस्तेमाल के बावजूद उन्होंने कांग्रेस को इस आक्रामकता के खिलाफ डटी एकमात्र राष्ट्रीय शक्ति बताया।
उन्होंने कहा कि सरकारी एजेंसियों के निशाने और लगातार उत्पीड़न के बीच पार्टी के कार्यकर्ता गांव-गांव संविधान की हिफाजत के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सोनिया ने रेखांकित किया कि संस्थागत पतन को लेकर अब जनता में बेचैनी साफ दिख रही है और देश जल्द ही एक पारदर्शी व निष्पक्ष शासन की वापसी का गवाह बनेगा।
अक्सर भाजपा के निशाने पर रहने वाले 1975 के आपातकाल का बचाव करते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि उस दौर में लोकतांत्रिक अधिकारों और ‘हेबियस कॉर्पस’ (बंदी प्रत्यक्षीकरण) पर पाबंदियां संविधान के ही दायरे में लगाई गई थीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि वे देश भर में सरकारी इमारतों में आगजनी, संगठित हिंसा और अराजकता से पैदा हुए गंभीर संकट से जूझ रही थीं।
उन्होंने याद दिलाया कि उस असाधारण परिस्थिति के बावजूद इंदिरा गांधी ने 1977 में स्वतंत्र आम चुनाव कराने का फैसला किया और बाद में उस दौर की ज्यादतियों के लिए जनता के सामने सार्वजनिक रूप से खेद भी जताया, जिसे आज के अघोषित दबाव की तुलना में देखा जाना चाहिए।
वर्ष 2004 में जनादेश मिलने के बावजूद प्रधानमंत्री का पद छोड़ने के अपने निर्णय पर सोनिया गांधी ने दोहराया कि उन्हें उस फैसले पर आज भी रत्ती भर पछतावा नहीं है और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ उनकी साझेदारी सत्ता और संगठन के बीच संतुलन का श्रेष्ठ उदाहरण थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी तुलना पर सीधा प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी और मोदी की राजनीतिक सोच दो बिल्कुल विपरीत ध्रुवों पर खड़ी है, जिनका आपस में कोई मेल नहीं हो सकता। उन्होंने साफ किया कि कांग्रेस को आरएसएस से संगठन या नेतृत्व का कोई सबक सीखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कांग्रेस में मल्लिकार्जुन खड़गे और डॉ. मनमोहन सिंह जैसे नेता किसी गुप्त रिमोट कंट्रोल से नहीं, बल्कि अपने जमीनी संघर्ष और योग्यता के दम पर शीर्ष तक पहुंचे हैं। सोनिया गांधी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कांग्रेस ने भाजपा और संघ की विचारधारा से न कभी समझौता किया है और न ही भविष्य में कभी करेगी।
