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5 ट्रिलियन की रफ्तार के बीच ‘घाटे’ का झटका: रुपया रिकॉर्ड गिरावट पर, आयात ने बढ़ाई चिंता

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  • जीडीपी बढ़कर 4.51 ट्रिलियन डॉलर के अनुमान पर, लेकिन व्यापार घाटा दोगुना

  • डॉलर के मुकाबले रुपया 11 साल के निचले स्तर पर, लगभग 50 फीसदी फिसला

✍️ प्रहरी संवाददाता, नई दिल्ली | भारत की अर्थव्यवस्था जहां एक ओर 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए वैश्विक स्तर पर चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर व्यापार घाटे में तेज बढ़ोतरी और रुपये की गिरावट ने आर्थिक तस्वीर के दूसरे पहलू को भी सामने ला दिया है।

सरकारी अनुमानों के अनुसार, 2025 के अंत तक भारत की जीडीपी 4.18 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई थी, जबकि 2026 में इसके 4.51 ट्रिलियन डॉलर तक जाने का अनुमान है। इसी बीच वाणिज्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों ने व्यापार संतुलन पर गंभीर संकेत दिए हैं।

फरवरी 2026 में माल व्यापार घाटा 27.1 अरब डॉलर दर्ज किया गया, जो फरवरी 2025 के 14.42 अरब डॉलर के मुकाबले लगभग दोगुना है। इससे पहले जनवरी 2026 में यह घाटा 34.7 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच चुका था।

आंकड़ों के अनुसार, फरवरी में आयात 24 प्रतिशत बढ़कर 63.71 अरब डॉलर हो गया, जबकि निर्यात 0.8 प्रतिशत घटकर 36.61 अरब डॉलर रह गया। सोना-चांदी, इलेक्ट्रॉनिक सामान और औद्योगिक मशीनरी के आयात में वृद्धि को प्रमुख कारण माना जा रहा है। चालू वित्त वर्ष 2025-26 के अप्रैल से फरवरी तक कुल माल आयात 713.5 अरब डॉलर दर्ज किया गया, जबकि निर्यात 402.93 अरब डॉलर रहा।

सेवाओं के निर्यात में बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन माल व्यापार का असंतुलन बना हुआ है। पूरे वित्त वर्ष के लिए कुल व्यापार घाटा लगभग 119 अरब डॉलर के आसपास रहने का अनुमान है।

इसी अवधि में भारतीय मुद्रा पर भी दबाव बढ़ा है। डॉलर के मुकाबले रुपया 11 वर्षों के निचले स्तर पर पहुंच गया है। मार्च 2014 में जहां 1 डॉलर की कीमत लगभग 59  रुपये थी, वहीं 27 मार्च 2026 को यह 94.67 रुपये दर्ज की गई। भारतीय करेंसी में 11 साल में 50 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है, जबकि पिछले एक वर्ष में ही रुपये में 10.67 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है।

बाजार विश्लेषकों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर डॉलर की मजबूती, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और विदेशी निवेश के प्रवाह में बदलाव का असर विनिमय दर पर देखा जा रहा है। भारतीय रिज़र्व बैंक की ओर से विनिमय बाजार पर निगरानी बनाए रखी जा रही है।

इन आंकड़ों के बीच आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार, आयात-निर्यात का अंतर और मुद्रा की स्थिति एक साथ प्रमुख संकेतक के रूप में उभरकर सामने आए हैं। आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह विफल साबित होने वाली भाजपा सरकार की नीतियों को ‘ऐतिहासिक’ और ‘साहसी’ बताकर बेचना, इस दौर की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है।


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