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यूएन ने मतदाता सूची से नाम हटाने की ‘SIR’ प्रक्रिया पर भारत सरकार से मांगा जवाब 

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  • विपक्ष का तीखा तंज, कहा – ‘ज्ञानेश कुमार की प्रतिभा’ की UN में भी चर्चा’

✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई | नई दिल्ली | भारत में चुनाव आयोग द्वारा चलाई जा रही डिजिटल स्क्रूटनी यानी ‘SIR’ प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का गंभीर मामला अब अंतरराष्ट्रीय गलियारों में गूंज उठा है। संयुक्त राष्ट्र (UN) के तीन विशेष प्रतिवेदकों ने इस समूची प्रक्रिया की पारदर्शिता और इसके चलते लाखों नागरिकों के मताधिकार छिनने के आरोपों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए भारत सरकार से 60 दिनों के भीतर आधिकारिक स्पष्टीकरण मांगा है। यूएन की इस तीखी दखल ने भारतीय लोकतंत्र की साख से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके बाद देश के भीतर एक बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है।

1 मई 2026 को भेजे गए इस पत्र में अल्पसंख्यक मामलों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता के वैश्विक विशेषज्ञों ने मुख्य रूप से एआई-आधारित अपारदर्शी एल्गोरिदम के इस्तेमाल और उसके सामाजिक प्रभावों को रेखांकित किया है।

रिपोर्ट में विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि वहां सूची से हटाए गए मतदाताओं में लगभग 95 फीसदी संख्या मुस्लिम समुदाय की थी, जबकि क्षेत्र में उनकी कुल आबादी महज 25 फीसदी के करीब है।

इस अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट को हथियार बनाकर समूचे विपक्ष ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा ने इस घटनाक्रम पर बेहद तीखा तंज कसते हुए कहा कि ज्ञानेश कुमार की समझदारी और काबिलियत की चर्चा अब संयुक्त राष्ट्र में हो रही है, जो पूरे देश के लिए एक ऐसा गर्व का पल है जिसे आने वाली पीढ़ियां हमेशा याद रखेंगी।

वहीं दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने भी इस डिजिटल विलोपन प्रक्रिया को पूरी तरह असंवैधानिक करार देते हुए चुनाव आयोग पर सीधा हमला बोला है। सागरिका घोष ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग बिना किसी जवाबदेही वाले एल्गोरिदम के सहारे नागरिकों के मौलिक अधिकारों को खत्म कर रहा है और ‘वैनिश कुमार’ की अगुवाई वाले इस तंत्र ने वैश्विक मंच पर भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को शर्मसार किया है।

घरेलू स्तर से उठकर अब अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचे इस विवाद ने विदेश और कानून मंत्रालय के सामने एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है, जहां सरकार को अब दो महीनों के भीतर यूएन के इन तीखे तकनीकी और संवैधानिक सवालों का प्रामाणिक जवाब देना होगा।

 


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