✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई | आषाढ़ी वारी के दौरान आलंदी क्षेत्र में लगातार हो रही बारिश और बाढ़ जैसे हालात के बीच पुणे महानगर पालिका ने वारकरियों के ठहराव के लिए शहर की 101 मनपा स्कूलों में मंगलवार से रविवार तक अवकाश घोषित कर दिया है। इन स्कूलों को अस्थायी राहत एवं निवास केंद्र बनाया जाएगा। प्रशासन इसे संवेदनशील निर्णय बता रहा है, लेकिन सवाल यह है कि हर साल होने वाली वारी के लिए आखिर स्थायी इंतजाम कब होंगे? क्या हर बार सबसे आसान विकल्प स्कूलों को बंद करना ही रह जाएगा?
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के मार्गदर्शन में लिए गए इस फैसले के साथ 12 जुलाई तक पुणे शहर में लागू पानी कटौती भी स्थगित कर दी गई है। यानी जिन नागरिकों को रोज पानी बचाने की सीख दी जा रही थी, उनके लिए बनी कटौती एक आदेश में खत्म हो गई।
इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि धार्मिक आयोजनों के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध कराया जा सकता है, तो आम दिनों में यही सुविधा क्यों नहीं मिलती?
उधर, पुणे की महापौर मंजुषा नागपुरे का कहना है कि जरूरत पड़ने पर अन्य मनपा स्कूलों को भी राहत केंद्र बनाया जाएगा और किसी भी वारकरी को असुविधा नहीं होने दी जाएगी। प्रशासन, जिला तंत्र और राज्य सरकार के समन्वय से भोजन, पेयजल, स्वास्थ्य और स्वच्छता की व्यवस्था की जा रही है।
प्रशासन का यह कदम स्वागतयोग्य है, क्योंकि वारकरी राज्य की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं।
लेकिन असली सवाल व्यवस्था पर है। आषाढ़ी वारी कोई अचानक आने वाली घटना नहीं, बल्कि हर वर्ष तय तिथियों पर होने वाला विशाल आयोजन है। फिर भी हर बार बारिश शुरू होते ही स्कूल बंद करने, अंतिम समय में राहत केंद्र बनाने और आपातकालीन फैसलों को ही उपलब्धि की तरह पेश किया जाता है।
लगता है कि प्रशासन ने स्थायी योजना बनाने के बजाय यह मान लिया है कि वारकरी आएंगे तो स्कूल बंद होंगे और बच्चे घर बैठेंगे। श्रद्धा के इस महापर्व में श्रद्धालुओं को सम्मान जरूर मिले, लेकिन शिक्षा को हर बार सबसे आसान विकल्प बनाना भी किसी दूरदर्शी व्यवस्था का प्रमाण नहीं कहा जा सकता।