चार साल बाद ‘नो-एग्जिट’ फॉर्मूले पर मंथन, सेवा विस्तार से पक्की नौकरी की राह होगी आसान
आंतरिक समीक्षा में सामने आई ऑपरेशनल निरंतरता की जरूरत
पहले बैच की सेवामुक्ति से पहले नियमों में संशोधन की तैयारी, रक्षा मंत्रालय के पाले में गेंद
✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई | नई दिल्ली | अग्निपथ योजना को लेकर जारी राजनीतिक बहस, युवाओं की चिंताओं और सैन्य हलकों की ऑपरेशनल प्राथमिकताओं के बीच सेना के तीनों अंगों ने भर्ती ढांचे में व्यापक फेरबदल का खाका तैयार किया है। रक्षा प्रतिष्ठान के शीर्ष सूत्रों के अनुसार, चार साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद 75 फीसदी अग्निवीरों को अनिवार्य रूप से बाहर करने के नियम में ढील देने की तैयारी है। नए प्रस्तावित मॉडल के तहत 25 प्रतिशत मेरिट-प्राप्त जवानों को सीधे स्थायी कैडर में नियमित करने के साथ ही शेष 75 प्रतिशत जवानों को बाहर का रास्ता दिखाने के बजाय दो वर्ष का अतिरिक्त ‘सर्विस एक्सटेंशन’ (सेवा विस्तार) देने का विकल्प विचाराधीन है। इस प्रस्ताव पर मुहर लगते ही योजना में चार साल की अल्पकालिक संविदा की बाध्यता समाप्त हो जाएगी और हर चयनित जवान को न्यूनतम छह वर्ष तक वर्दी में रहने का अवसर मिल सकेगा।
इस रणनीतिक बदलाव की सबसे बड़ी वजह सेना की कॉम्बैट रेडीनेस और तकनीकी निरंतरता बनी है। तीनों सेनाओं द्वारा की गई आंतरिक समीक्षा में यह बात प्रमुखता से रेखांकित की गई है कि आधुनिक वायु रक्षा प्रणाली, रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और ड्रोन नेटवर्क जैसे जटिल युद्धक साजो-सामान के संचालन में महारत हासिल करने में जवान को कम से कम तीन से चार साल का समय लगता है। ऐसे में प्रशिक्षित और तकनीकी रूप से दक्ष जवानों को चार साल में सेवामुक्त कर देने से अग्रिम मोर्चों की परिचालन क्षमता प्रभावित होने की आशंका जताई गई। इसी खाई को पाटने के लिए सैन्य कमान ने सेवा विस्तार का फॉर्मूला सुझाया है, ताकि सेना को अनुभवी मैनपावर का पूरा लाभ मिल सके।
सैन्य हलकों के साथ-साथ राजनीतिक और रणनीतिक गलियारों में भी इस प्रस्ताव को बेहद अहम माना जा रहा है। सरकार एक तीर से दो निशाने साधने की जुगत में है। इससे फायदा यह होगा कि न तो सरकार को सार्वजनिक तौर पर अपनी भूल स्वीकार करनी पड़ेगी और न ही विपक्ष को यह कहने का मौका मिलेगा कि योजना बंद हो गई; बल्कि इसे ‘अग्निपथ का परिष्कृत चरण’ बताकर चुनावी समर में भुनाया जाएगा।
हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार और हिमाचल जैसे राज्यों में, जहां सेना की नौकरी युवाओं के लिए सामाजिक सम्मान और आजीविका की धुरी है, वहां ‘चार साल की संविदा’ का ठप्पा लगातार संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। यदि यह फॉर्मूला अंतिम रूप लेता है, तो योजना को वापस लिए बिना इसके सबसे विवादास्पद ‘अनिवार्य एग्जिट’ पहलू का समाधान निकल जाएगा।
प्रस्तावित प्रारूप के अनुसार, छह साल की कुल सेवा पूरी होने के बाद इन जवानों की दक्षता का कड़े सैन्य मानकों पर दोबारा मूल्यांकन किया जाएगा और सेना की रिक्तियों के अनुरूप योग्य सैनिकों को नियमित कैडर में स्थायी रूप से समाहित करने का रास्ता पूरी तरह खुला रहेगा।
