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आईबीबीआई आंकड़ों से बड़ा खुलासा: दिवालिया समाधान प्रक्रिया बनी अडानी समूह के विस्तार का जरिया

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  • 16 कंपनियां नाम कर बैंकों को कराया ₹97,700 करोड़ का हेयरकट, धारा 32ए से धुल गए पुराने दाग

✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई/नई दिल्ली | देश की दिवालिया समाधान व्यवस्था यानी इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) संकटग्रस्त बुनियादी ढांचा कंपनियों के उद्धार से कहीं अधिक अडानी समूह के आक्रामक साम्राज्य विस्तार का सबसे कारगर जरिया साबित हुई है।

भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) के आधिकारिक आंकड़ों और सितंबर 2026 के स्वतंत्र वित्तीय विश्लेषण से यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि अडानी समूह ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के समक्ष कुल 26 मामलों में समाधान योजनाएं पेश कीं और 61.5 प्रतिशत की भारी सफलता दर दर्ज करते हुए 16 रणनीतिक कंपनियों पर एकतरफा मालिकाना हक हासिल कर लिया।

इन अधिग्रहीत संपत्तियों में 14 कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (सीआईआरपी) और 2 परिसमापन (लिक्विडेशन) के मामले शामिल हैं। हालांकि, इस आक्रामक कॉरपोरेट विस्तार की भारी कीमत सरकारी खजाने और आम जनता की गाढ़ी कमाई से चलने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को चुकानी पड़ी है। वित्तीय लेनदारों के कुल 1.31 लाख करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के एवज में बैंकों की झोली में महज 33,000 करोड़ रुपये ही आए, जिसका अर्थ है कि बैंकों को 74.6 प्रतिशत यानी लगभग 97,700 करोड़ रुपये का विशाल ‘हेयरकट’ (नुकसान) अपनी बैलेंस शीट पर दर्ज करना पड़ा।

एनसीएलटी की इस समूची समाधान प्रक्रिया का सबसे बड़ा और अप्रत्याशित वित्तीय लाभ अडानी समूह के ऊर्जा प्रभाग यानी अडानी पावर को मिला है। समूह ने बिजली क्षेत्र की कई दिग्गज संकटग्रस्त कंपनियों जीएमआर छत्तीसगढ़ एनर्जी, कोरबा वेस्ट पावर, एस्सार पावर एमपी, लैंको अमरकंटक, कोस्टल एनर्जेन और विदर्भ इंडस्ट्रीज पावर का नाममात्र के मूल्यांकन पर अधिग्रहण कर अपनी कुल स्थापित उत्पादन क्षमता में सीधे 5.5 से 7.8 गीगावॉट का अभूतपूर्व इजाफा कर लिया।

आंकड़ों की पड़ताल से साफ है कि लैंको अमरकंटक के मामले में बैंकों के 14,600 से 15,600 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के बदले समूह को केवल 4,101 करोड़ रुपये का भुगतान करना पड़ा। इसी तरह, विदर्भ इंडस्ट्रीज पावर में सुरक्षित वित्तीय लेनदारों के 6,200 करोड़ रुपये के दावों का अंतिम निपटारा महज 3,706 करोड़ रुपये में कर दिया गया, जबकि कोस्टल एनर्जेन के 11,677 करोड़ रुपये के कुल कर्ज के एवज में 3,330 से 3,500 करोड़ रुपये में पूरा सौदा तय हुआ।

इन औने-पौने दामों में किए गए अधिग्रहणों के दम पर अडानी पावर की परिचालन क्षमता 18.1 से 18.3 गीगावॉट के स्तर को पार कर गई है, जिसमें से लगभग एक-तिहाई हिस्सा सीधे तौर पर दिवालिया प्रक्रिया से हासिल किए गए इन थर्मल प्लांट्स का है। जमीन अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंजूरियों और निर्माण में लगने वाले भारी पूंजीगत खर्च वाले नए ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स के मुकाबले समूह को यह चालू और तैयार बुनियादी ढांचा लगभग शून्य के बराबर पूंजीगत लागत पर हासिल हो गया।

अधिग्रहण की मुहर लगते ही इन बिजली संयंत्रों के परिचालन वित्तीय प्रदर्शन में हैरतअंगेज उछाल दर्ज किया गया। वित्तीय रिकॉर्ड्स के मुताबिक, रायपुर पावर प्लांट का ईबीआईटीडीए (EBITDA) अधिग्रहण के समय दर्ज 210 करोड़ रुपये से कई गुना बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 2,350 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। वहीं महान संयंत्र का ईबीआईटीडीए तीन गुना उछलकर 1,600 करोड़ रुपये के पार निकल गया और वर्षों से घाटे के दलदल में धंसा रायगढ़ प्लांट भी अचानक भारी मुनाफे में तब्दील हो गया।

इन नाटकीय वित्तीय सुधारों के बूते समूह ने भविष्य में 23.7 गीगावॉट की भारी अतिरिक्त क्षमता जोड़ने का मजबूत प्लेटफॉर्म तैयार कर लिया है, जिसका अधिकांश हिस्सा इन्हीं अधिग्रहीत परिसंपत्तियों की सस्ती साइट्स पर ब्राउनफील्ड विस्तार के जरिए अंजाम दिया जा रहा है।

ऊर्जा क्षेत्र से परे बंदरगाह, रियल एस्टेट और बुनियादी ढांचे में भी दिवालिया संपत्तियों को रणनीतिक रूप से समूह की झोली में डाला गया। अडानी पोर्ट्स ने दक्षिण भारत के व्यापारिक गलियारे पर अपनी पकड़ मजबूत करते हुए कराईकल पोर्ट का अधिग्रहण 1,485 से 1,583 करोड़ रुपये में पूरा किया, वहीं मुंबई के प्राइम कमर्शियल हब बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी) में स्थित हाउसिंग डेवलपमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (एचडीआईएल) की बेशकीमती रियल एस्टेट संपत्तियां अडानी प्रॉपर्टीज के खाते में चली गईं।

समाधान प्रक्रिया का सबसे बड़ा और विवादित सौदा जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (जेएएल) का रहा, जहां अडानी एंटरप्राइजेज की 14,535 से 15,343 करोड़ रुपये की समाधान योजना पर मुहर लगाई गई। इस महा-सौदे में वित्तीय लेनदारों के करीब 57,000 से 60,637 करोड़ रुपये के विशाल दावों के मुकाबले बैंकों को महज 24 से 26 प्रतिशत की नाममात्र वसूली नसीब हो सकी। नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) द्वारा वेदांता समूह की कानूनी चुनौती को खारिज किए जाने के बाद मार्च 2026 में एनसीएलटी ने इस अधिग्रहण को अंतिम हरी झंडी दी थी।

इस पूरे कॉरपोरेट घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील और विवादास्पद पहलू वह कानूनी सुरक्षा कवच है, जिसके तहत अधिग्रहण पूरा होते ही अधिग्रहीत कंपनियों और उनसे जुड़े गंभीर वित्तीय अपराधों का अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया। आईबीसी की बहुचर्चित धारा 32ए (Section 32A) के विधिक प्रावधानों के तहत जैसे ही किसी संकटग्रस्त कंपनी का नियंत्रण नए प्रमोटर यानी अडानी समूह के हाथों में गया, उस कंपनी को पूर्ववर्ती प्रबंधन द्वारा किए गए तमाम वित्तीय घपलों, बैंक धोखाधड़ी, डायवर्जन और मनी लॉन्ड्रिंग के आपराधिक मुकदमों व देनदारियों से कानूनी तौर पर ‘क्लीन स्लेट’ (पूर्ण उन्मुक्ति) मिल गई।

इसका सीधा असर यह हुआ कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) द्वारा वर्षों से की जा रही सघन आपराधिक जांचें और दर्ज मुकदमे नए प्रबंधन के आते ही अदालतों में अप्रभावी और निष्प्रभावी होकर फाइलों में दब गए। कोस्टल एनर्जेन इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण बना, जहां पूर्ववर्ती प्रमोटरों के खिलाफ धन के हेरफेर और मनी लॉन्ड्रिंग की लंबी जांचें चलीं, लेकिन अडानी-डीआईआईटी गठजोड़ द्वारा अधिग्रहण की प्रक्रिया मुकम्मल होने और बाद के अदालती आदेशों के बाद कंपनी के ऊपर से सभी आपराधिक आरोप स्वतः समाप्त हो गए।

इस व्यवस्था ने बैंकों के भारी नुकसान और जांच एजेंसियों की वर्षों की पड़ताल को दरकिनार करते हुए नए खरीदार को अरबों रुपये की पूरी तरह बेदाग परिसंपत्तियों का निर्विवाद मालिक बना दिया, जिसने अडानी समूह को देश के बुनियादी ढांचा क्षेत्र का सबसे शक्तिशाली एकाधिकारवादी खिलाड़ी बना दिया है।


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