फडणवीस सरकार में 3 साल से फाइलों की फॉरवर्डिंग बाजीगरी
अधिकारी बाबू ‘फॉरवर्ड-फॉरवर्ड’ खेलता रहा, बिल्डर ने भूखंड हथिया लिया
✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई | ‘एक क्लिक पर पारदर्शी राजकाज’ और ‘100 दिन में त्वरित समाधान’ का सरकारी ढोल कितना खोखला है, इसकी नब्ज टटोलनी हो तो देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के पॉश इलाके पवई में ₹2,000 करोड़ से अधिक की 14.5 एकड़ प्राइम लैंड के सरकारी रिकॉर्ड खंगाल लीजिए। महाराष्ट्र की सत्ता में बैठी बीजेपी गठबंधन सरकार जब अपनी नाकामियों और कॉरपोरेट परस्ती पर पर्दा डालने के लिए ‘डिजिटल गवर्नेंस’ का चमकीला मुलम्मा चढ़ाती है, तो मंत्रालय के एयरकंडीशंड कमरों से पवई और तिरंदाज जैसी खुली महालूट की पटकथाएं लिखी जाती हैं। मौजे पवई के सीटीएस 6A, 7/1A और मौजे तिरंदाज के सीटीएस 20, 22 की इस बेशकीमती जमीन पर बिल्डर लॉबी ने प्रशासनिक साठगांठ से फर्जीवाड़े का जो जाल बुना, उस पर नकेल कसने के बजाय सरकार के आईएएस-बाबू अपनी जिम्मेदारी का कफन एक ‘फॉरवर्ड’ बटन दबाकर सिलते रहे।
यह बीजेपी की फडणवीस सरकार के उस तथाकथित ‘स्मार्ट सिस्टम’ का असली चेहरा है, जहां आम नागरिक की शिकायतें न्याय पाने के लिए नहीं, बल्कि सरकारी पोर्टलों पर ‘निस्तारित’ का फर्जी सांख्यिकी तमगा बटोरने के लिए दर्ज की जाती हैं। 600 दिनों से अधिक समय तक इंसाफ की गुहार लगा रहे फरियादी को जांच के नाम पर मंत्रालय ने केवल डिजिटल पर्चियों का झुनझुना थमाया, जिस पर हर बार बेशर्मी से एक ही मुहर लगी- ‘पत्र संबंधित विभाग को प्रेषित किया गया’।
मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर मुख्य सचिव, राजस्व और गृह विभाग के चक्कर काटती फाइलों का यह खेल साबित करता है कि सरकार के लिए ‘ई-गवर्नेंस’ महज जवाबदेही से भागने और जनता को भटकाने का सबसे सुरक्षित प्रशासनिक हथियार बन चुका है।
बीजेपी सरकार में इस संगठित प्रशासनिक अंधेरगर्दी के तार इतने गहरे हैं कि 18 अप्रैल 1984 के वैध प्रॉपर्टी कार्ड, 2005 की अपीलीय कार्यवाहियां, 2006 से अदालत में विचाराधीन मुकदमा और 23 दिसंबर 2020 की संदिग्ध सेल डीड के अकाट्य दस्तावेजी सबूत मेज पर पटकने के बावजूद हुकूमत के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। तहसील, उपसंचालक भू-अभिलेख, निबंधन कार्यालय और मंत्रालय के आला हाकिमों की पूरी फौज ने केवल एक-दूसरे के पाले में गेंद फेंकने की काहिली को अपनी ‘ड्यूटी’ मान लिया।
जिस सरकार का बुलडोजर तंत्र कॉरपोरेट बिल्डरों को कब्जा दिलाने के लिए 6 जून 2024 को भारी पुलिस बंदोबस्त के साथ भीमनगर की गरीब बस्तियों को रौंदने में पलक झपकते मुस्तैद हो जाता है, वही तंत्र 2,000 करोड़ रुपए की जमीन पर महज 8.5 लाख रुपए की नाममात्र स्टांप ड्यूटी के फर्जीवाड़े और अधिकार-विहीन पावर ऑफ अटॉर्नी की जांच के नाम पर लकवाग्रस्त हो जाता है। किसी एक अफसर में यह रीढ़ नहीं दिखी कि वह मौके पर जाकर मुआयना करे, मूल सेल डीड जब्त कर फॉरेंसिक जांच बैठाए या कॉरपोरेट सिंडिकेट के आकाओं को तलब कर बयान दर्ज करे।
अब सूचना का अधिकार (RTI) के जरिए बीजेपी सरकार की इसी आत्ममुग्ध और रसूखदारों के आगे नतमस्तक बाबूशाही की दुखती रग पर हाथ रख दिया गया है। सरकारी तंत्र से अब हिसाब मांगा जा रहा है कि फाइलों पर कुंडली मारकर बैठे उन अफसरों के नाम सार्वजनिक किए जाएं, जिन्होंने नोटशीट पर कॉरपोरेट सौदेबाजी को संरक्षण दिया। हिसाब इस बात का भी मांगा गया है कि अगर 20 महीने में 8 बार फाइलें सिर्फ इधर से उधर दौड़ाकर जांच की फाइल बंद की गई, तो वह आदेश किस ‘कीमत’ और किस ‘आका’ के इशारे पर जारी हुआ।
यदि हजारों करोड़ की जमीनों पर सरकार का काम सिर्फ एक पोस्ट ऑफिस की तरह चिट्ठियां सरकाना और रसूखदारों को अभयदान देना ही रह गया है, तो फिर ‘जीरो टॉलरेंस’ और ‘सुशासन’ का पाखंड पूरी तरह बंद होना चाहिए। व्यवस्था यह गांठ बांध ले कि फाइलों का डिजिटल चक्कर काटना कोई प्रशासनिक उपलब्धि नहीं है; जनता इसे सुशासन नहीं, बल्कि महाघोटाले पर सरकारी मुहर मानती है।
