1969 के Agreement for Sale की वैधता, 2020 की Sale Deed और 2024 में दर्ज समझौते के बीच कथित विरोधाभासों की पड़ताल की मांग
गैर-हस्ताक्षरकर्ता पक्षों के अधिकार सुरक्षित रखने वाले अदालत के आदेश के बावजूद पूर्व कार्यवाही की जांच पर सवाल
✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई | जब कोविड महामारी के दौरान मुंबई समेत पूरा देश लॉकडाउन में था, तब पवई–तिरंदाज की करीब 14.5 एकड़ विवादित जमीन के हस्तांतरण से जुड़ा घटनाक्रम अब न्यायिक जवाबदेही के गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। शिकायतकर्ता पक्ष के मुताबिक, 23 दिसंबर 2020 को निरंजन हीरानंदानी से जुड़ी HGP Community Pvt. Ltd. के पक्ष में Sale Deed दर्ज हुई, जबकि जमीन का विवाद अदालत में लंबित था। इसके बाद जून 2021 में सूट के वादी नंबर-1 ने कथित Sale Deed पर आपत्ति जताते हुए मुलुंड तहसीलदार को दो शिकायतपत्र दिए। लेकिन उनकी शिकायतों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई।
विवाद का सबसे बड़ा मोड़ 2024 में आया, जब Suit No. 4962/2006 में Exhibit-173 के Consent Terms के जरिए 23 अक्टूबर 1969 के Agreement for Sale को कथित तौर पर शुरू से अमान्य -void ab initio-बताया गया। सवाल है कि जिस करार के इर्द-गिर्द 18 साल मुकदमा चला, उसकी वैधता पर इस निर्णायक रुख का आधार क्या था और पहले की कार्यवाही से इसका मिलान किसने किया?
प्रतिवादी 4A–4D के पक्ष के अनुसार, दीवानी अदालत ने अपने आदेश में, यह स्पष्ट किया है कि Exhibit-173 पर हस्ताक्षर नहीं करने वाले पक्षकार विशेष रूप से प्रतिवादी 2, 3 और 4A से 4D उक्त Consent Terms से बाध्य नहीं होंगे और उनके कानूनी अधिकार सुरक्षित रहेंगे। लेकिन प्रतिवादी 4A–4D की आपत्ति यहीं खत्म नहीं होती। उनका कहना है कि समझौता उन पर लागू न होने की बात और समझौते को रिकॉर्ड पर लेते समय पहले की विरोधाभासी कार्यवाहियों की जांच दो अलग कानूनी प्रश्न हैं। यदि वर्षों तक अदालत के सामने दिए गए बयानों, वादपत्रों या शपथपत्रों और बाद में सामने आए रुख में महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं, तो क्या केवल समझौते को कुछ पक्षों तक सीमित मान लेना न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़े सवालों का उत्तर है?
प्रतिवादी 4A–4D का आरोप है कि उक्त जमीन के मूल मालिक द्वारा मुलुंड तहसीलदार के नाम जून 2021भेजे गए दोनों शिकायतपत्रों और उनमें उठाई गई आपत्तियों पर अदालत ने पर्याप्त संज्ञान नहीं लिया तथा चुनिंदा प्रतिवादियों के Consent Terms पर सहमत होने की परिस्थितियों की जांच का निर्देश भी नहीं दिया। इन दावों की पुष्टि संबंधित शिकायतपत्रों, अदालत में पेश रिकॉर्ड और आदेश-पत्रों से होना जरूरी है।
फिर भी सवाल गंभीर है: क्या वादी नंबर-1 की कथित आपत्तियों को 2020 की Sale Deed, संबंधित Power of Attorney और 2024 के Consent Terms के साथ रखकर परखा गया? क्या अदालत के सामने पहले के बयानों और बाद के हलफनामे के बीच संभावित विरोधाभासों पर स्पष्ट सुनवाई हुई? और यदि नहीं, तो क्या इन बिंदुओं पर उचित कानूनी आवेदन के जरिए न्यायिक जांच की मांग पर विचार होना चाहिए?
मामला अब केवल जमीन के स्वामित्व का नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में कथित विरोधाभासों की जांच का भी है। प्रतिवादी पक्ष ने आरोप लगाया है कि बिल्डर ने बयान बदलवाने के लिए डिफेंडेंट्स के वकील और चुनिंदा प्रतिवादियों को करोड़ों रुपये दिए और इसके समर्थन में सबूत होने का दावा किया है। यह गंभीर आरोप है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि, दस्तावेजों और कथित वित्तीय लेन-देन की जांच जरूरी है; इसे जांच से पहले सिद्ध रिश्वतखोरी नहीं माना जा सकता। यदि संबंधित पक्षों के पास बैंक रिकॉर्ड, भुगतान संबंधी दस्तावेज, संदेश या अन्य प्रमाण हैं, तो उनकी प्रामाणिकता और संदर्भ की जांच ही आरोपों की वास्तविकता तय कर सकती है।
ऐसी स्थिति में प्रतिवादी 4A–4D की मांग है कि मूल Agreement for Sale, Exhibit-173, सभी संबंधित हलफनामों, जून 2021 के शिकायतपत्रों, Power of Attorney, Sale Deed और राजस्व रिकॉर्ड की क्रमवार जांच कराई जाए तथा जरूरत के मुताबिक विशेष जांच दल (SIT) गठित करने पर विचार हो।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 के लागू प्रावधानों के अधीन साक्ष्य की स्वीकार्यता और प्रामाणिकता तथा भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत संभावित अपराधों का परीक्षण तथ्यों और घटना की तारीख के अनुरूप किया जाना होगा; पुराने घटनाक्रम पर लागू कानून का निर्धारण भी आवश्यक है।
दीवानी प्रक्रिया संहिता के Order XXIII Rule 3 के तहत समझौते की वैधता से जुड़ी आपत्ति और अदालत के समक्ष कथित गैरकानूनी समझौते के प्रश्नों का परीक्षण संबंधित न्यायिक रिकॉर्ड तथा लागू कानून के अनुसार होना चाहिए। यदि झूठे साक्ष्य या न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के ठोस आधार सामने आते हैं, तो सक्षम अदालत कानून के तहत उपयुक्त कार्रवाई पर विचार कर सकती है।
करीब 2,000 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य की बताई जा रही इस जमीन के विवाद में अब निर्णायक सवाल है: क्या 18 साल की कार्यवाही, 2021 की कथित आपत्तियों और 2024 के Consent Terms को एक साथ रखकर निष्पक्ष जांच होगी, ताकि प्रतिवादी 4A–4D के सुरक्षित बताए गए अधिकार केवल आदेश के शब्दों तक सीमित न रह जाएं और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े आरोपों की भी कानून के मुताबिक पड़ताल हो सके? न्याय व्यवस्था को ढाल बनाकर जमीन हड़पने की इस संगठित साजिश का पूरा सच बेनकाब करना जरूरी है।


