‘द कॉर्पोरेट लैंड ग्रैब’ – अदालत में मिली 18 साल से तारीख पर तारीख, बाहर तैयार हो गई ₹2,000 करोड़ की फर्जी सेल डीड
2006 से अदालत में लंबित विवाद के बीच 23 दिसंबर 2020 को HGP Community Pvt. Ltd. के नाम रजिस्ट्री
मूल पक्षकार के कथित इनकार के बावजूद पावर ऑफ अटॉर्नी पर कार्रवाई, अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल
समाचार प्रहरी स्पेशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट:
✍️ प्रहरी इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो, मुंबई | जब देश कोविड लॉकडाउन में बंद था, तब मुंबई के पवई और तिरंदाज की करीब 14.5 एकड़ बेशकीमती जमीन का सौदा कैसे हो गया? क्या मुमबई के कुछ भूमाफिया और बिल्डर निरंजन हीरानंदानी से जुड़े लोगों को प्रशासनिक तंत्र ने वह रास्ता उपलब्ध कराया, जिसे आम नागरिक के लिए बंद बताया जा रहा था? और सबसे बड़ा सवाल- जब जमीन का विवाद 2006 से अदालत में लंबित था, तब 23 दिसंबर 2020 को HGP Community Pvt. Ltd. के नाम रजिस्ट्री किस अधिकार के आधार पर कर दी गई?

शिकायत में आरोप है कि लॉकडाउन के दौरान प्रशासनिक अधिकारियों ने बिल्डर को जमीन हथियाने में मदद की। इन आरोपों की जांच अब केवल रजिस्ट्री तक सीमित नहीं रह सकती। पावर ऑफ अटॉर्नी किसने जारी की, उसमें बिक्री का अधिकार था या नहीं, दस्तावेजों की जांच किस अधिकारी ने की और आपत्तियों के बावजूद रजिस्ट्री की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई- इन सवालों का जवाब राजस्व और पंजीयन विभाग को देना होगा।
मामला पवई के CTS नंबर 6A और 7/1A तथा तिरंदाज के CTS नंबर 20 और 22 से जुड़ा है। शिकायतकर्ता के अनुसार, करीब 14.5 एकड़ इस जमीन की मौजूदा बाजार कीमत 2,000 करोड़ रुपये से अधिक है। वर्ष 2006 से सिविल मुकदमा लंबित होने के बावजूद 23 दिसंबर 2020 को HGP Community Pvt. Ltd. के पक्ष में सेल डीड दर्ज की गई। शिकायत में इस हस्तांतरण के पीछे निरंजन हीरानंदानी से संबंधित पावर ऑफ अटॉर्नी की भूमिका और उसके आधार पर जमीन बेचने के अधिकार को चुनौती दी गई है।
विवाद का सबसे विस्फोटक पहलू मूल पक्षकार अजय मोहन का कथित लिखित इनकार है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, उन्होंने 14 जून 2021 को मुलुंड तहसीलदार को दिए जवाब में HGP Community Pvt. Ltd. के पक्ष में सेल डीड निष्पादित करने से इनकार किया था। यदि प्रमाणित रिकॉर्ड इस इनकार की पुष्टि करता है, तो सवाल सीधे प्रशासन की जवाबदेही पर उठता है- जिस व्यक्ति ने दस्तावेज निष्पादित करने से इनकार किया, उसके नाम या अधिकार के आधार पर रजिस्ट्री कैसे हुई? क्या पावर ऑफ अटॉर्नी में बिक्री का स्पष्ट अधिकार था? क्या उसके निष्पादन, दायरे और वैधता की स्वतंत्र जांच की गई? और आपत्ति सामने आने के बाद अधिकारियों ने कार्रवाई करने के बजाय चुप्पी क्यों साध ली?
अब सब-रजिस्ट्रार कार्यालय, पावर ऑफ अटॉर्नी के मूल अभिलेख, स्टांप ड्यूटी आकलन, तहसीलदार के नोटिस और जवाब तथा अधिकारियों की फाइल-नोटिंग जांच के केंद्र में होने चाहिए। रजिस्ट्री हो जाना स्वामित्व का अंतिम प्रमाण नहीं है, खासकर तब जब जमीन पर वर्षों से मुकदमा चल रहा हो। इसी तरह, लंबित मुकदमा किसी दस्तावेज को स्वतः अवैध नहीं बनाता। लेकिन ऐसे मामले में प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वह हर अधिकार, हर हस्ताक्षर और हर दस्तावेज की स्वतंत्र पुष्टि करे- न कि प्रभावशाली बिल्डर के पक्ष में प्रक्रिया को आगे बढ़ाए।
इसके बाद 9 अक्टूबर 2024 की कथित सहमति-शर्तों ने विवाद को और गंभीर बना दिया। शिकायतकर्ता का दावा है कि इन शर्तों के जरिए पुराने विवाद के निपटारे की तस्वीर पेश की गई, जबकि जमीन के हस्तांतरण और अधिकारों पर मूल सवाल अब भी कायम थे। ऐसे में जांच का दायरा 2020 की रजिस्ट्री से आगे बढ़कर 2024 की सहमति-शर्तों तक जाना चाहिए। किसने किस अधिकार से समझौता किया, किन दस्तावेजों के आधार पर किया, अधिकारियों ने आपत्तियों पर क्या लिखित निर्णय दिया और क्या किसी स्तर पर बिल्डर को अनुचित लाभ पहुंचाया गया- इन सवालों से प्रशासन बच नहीं सकता।
यह मामला केवल एक जमीन की रजिस्ट्री का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की परीक्षा है, जिसमें अदालत में विवादित जमीन, कथित रूप से संदिग्ध पावर ऑफ अटॉर्नी और मूल पक्षकार के इनकार के बावजूद अरबों रुपये की संपत्ति का हस्तांतरण हो जाता है। आरोप सही हैं या नहीं, इसका फैसला जांच और अदालत करेगी; लेकिन प्रशासन को यह स्पष्ट करना ही होगा कि लॉकडाउन के बीच यह सौदा किसकी अनुमति, किसकी निगरानी और किसके संरक्षण में हुआ।
