1998 के बाद सबसे बड़ी सेंध; रुपये की रक्षा में RBI का कड़ा हस्तक्षेप
✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई | भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) में पिछले चार हफ्तों के दौरान 51.1 अरब डॉलर की भारी गिरावट दर्ज की गई है। 1998 के एशियाई वित्तीय संकट के बाद चार सप्ताह की अवधि में दर्ज की गई यह अब तक की सबसे बड़ी ऐतिहासिक गिरावट है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 4 सितंबर 2026 को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार $785.71 अरब के अपने सर्वकालिक उच्च स्तर (All-time High) पर था, जो 2 अक्टूबर 2026 को समाप्त सप्ताह तक घटकर $734.60 अरब पर आ गया। यानी 4 हफ्तों में कुल $51.11 अरब की शुद्ध कमी दर्ज हुई।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और बाजार विश्लेषकों के अनुसार, इस अप्रत्याशित कमी के पीछे अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में आई रिकॉर्ड कमजोरी को थामने के लिए केंद्रीय बैंक द्वारा किया गया आक्रामक हस्तक्षेप और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की निरंतर पूंजी निकासी प्रमुख वजहें हैं। विदेशी मुद्रा भंडार में आई इस अचानक गिरावट ने नीतिगत हलकों में रुपये पर बढ़ते दबाव और बाहरी आर्थिक झटकों से निपटने की क्षमता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
बाजार आंकड़ों के मुताबिक, भंडार में आई इस कमी के दो मुख्य घटक हैं – पहला, मुद्रा बाजार में आरबीआई द्वारा डॉलर की प्रत्यक्ष बिकवाली और दूसरा, वैल्यूएशन लॉस यानी मूल्यांकन में गिरावट। वैश्विक स्तर पर डॉलर सूचकांक (DXY) में मजबूती के चलते आरबीआई के गैर-अमेरिकी मुद्रा भंडार (यूरो, पाउंड, येन) और अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण भंडार के डॉलर मूल्य में स्वाभाविक ह्रास हुआ है।
इसके साथ ही, भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में अनिश्चितता और पश्चिमी बाजारों में ब्याज दरों को लेकर बने सख्त रुख के कारण विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी व डेट बाजारों से लगातार पूंजी निकाल रहे हैं। डॉलर की अत्यधिक मांग के कारण रुपये को अनियंत्रित गिरावट से बचाने के लिए आरबीआई को स्पॉट और फॉरवर्ड दोनों बाजारों में अपनी डॉलर परिसंपत्तियों को भुनाना पड़ा है।
अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से इस तीव्र गिरावट का सीधा प्रभाव देश के आयात कवर और बाह्य ऋण चुकाने की क्षमता पर पड़ता है। विदेशी मुद्रा भंडार कम होने से भारतीय आयातकों के लिए आयात लागत बढ़ने और आयातित मुद्रास्फीति (इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन) गहराने का जोखिम बना रहता है। हालांकि, केंद्रीय बैंक के सूत्रों का कहना है कि भारी गिरावट के बावजूद भारत का मौजूदा भंडार देश के लगभग 10 से 11 महीने के आयात खर्च को पूरा करने के लिए पर्याप्त है और 2013 के ‘टेपर टैंट्रम’ संकट की तुलना में भारत की बाह्य स्थिति आज भी मजबूत वित्तीय सुरक्षा घेरे में मौजूद है। वर्तमान में आरबीआई की प्राथमिकता रुपये में अत्यधिक अस्थिरता को रोकना है, ताकि घरेलू मुद्रा का अवमूल्यन नियंत्रित दायरे में बना रहे।
