ईंधन-कारखानों की बढ़ती कीमतों से उड़े ‘अच्छे दिनों’ के परखच्चे
भाजपा सरकार की विफल नीतियों की मार झेल रही आम जनता
✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई | वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के ताज़ा आंकड़ों ने भाजपा सरकार के उन दावों की कलई खोल दी है, जिनमें अर्थव्यवस्था की मजबूती और महंगाई पर काबू पाने की बात कही जा रही थी। सितंबर महीने में थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर अगस्त के 9.92% से सीधे उछलकर 11.39% पर पहुंच गई है। वर्ष 2022-23 की नई आधार-वर्ष श्रृंखला में यह अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर के दौरान थोक महंगाई की संचयी दर 9.85% दर्ज की गई है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह शून्य से नीचे 0.2% पर थी। आंकड़ों का यह भारी अंतर साफ करता है कि देश में उत्पादन लागत और सप्लाई चेन पूरी तरह से गहरे संकट में घिर चुकी है।
इस पूरे झटके का केंद्र ऊर्जा क्षेत्र बना हुआ है, जहां कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की थोक कीमतों में सालाना आधार पर 57.32% का भारी उछाल आया है। सरकारी खजाने को भरने के लिए ईंधन और ऊर्जा पर लगातार वसूले जा रहे भारी-भरकम करों के बीच इस मोर्चे पर सबसे घातक मार पड़ी है। इसके चलते ईंधन और बिजली समूह की वार्षिक थोक महंगाई 25.85% पर पहुंच गई है, जो अगस्त में 22.93% थी। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को ढाल बनाकर सरकार भले ही वैश्विक दबाव की दुहाई दे, लेकिन हकीकत यह है कि घरेलू स्तर पर करों और शुल्कों में राहत न मिलने से पेट्रोल-डीजल, बिजली और कोयले के दाम बेकाबू हो चुके हैं। माल ढुलाई और बिजली महंगी होने से देश के पूरे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर तालेबंदी जैसी नौबत आ रही है।
ऊर्जा संकट की यह आग अब कारखानों से लेकर अनाज मंडियों तक फैल गई है। विनिर्मित उत्पादों यानी कारखानों में तैयार होने वाले माल की थोक महंगाई 8.37% से बढ़कर 9.76% हो गई है, जबकि थोक खाद्य सूचकांक की दर 8.66% पर पहुंच चुकी है। भाजपा सरकार के पास न तो इस बढ़ती लागत को रोकने का कोई विजन है और न ही उद्योगों को संबल देने की ठोस रणनीति। कच्चे माल की बढ़ी लागत को अब कंपनियां खुद वहन करने की स्थिति में नहीं बची हैं और यह पूरा बोझ खुलेआम उपभोक्ताओं पर डाला जा रहा है, जिससे दवाइयों, कपड़ों से लेकर रोजमर्रा के सामानों के दाम बेतहाशा बढ़ रहे हैं।
थोक बाजार के इस करंट ने खुदरा बाजार में आम आदमी की थाली पर भी सीधा हमला बोल दिया है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, खुदरा महंगाई दर 5.54% पर पहुंच गई है, जिसमें सबसे बड़ा झटका आम परिवार की रसोई को लगा है, जहां खुदरा खाद्य महंगाई उछलकर 7.74% हो चुकी है।
थोक और खुदरा दोनों मोर्चों पर एक साथ दर्ज हुआ यह तेज उछाल साबित करता है कि उत्पादन स्तर पर भड़की आग अब आम नागरिक की जेब को पूरी तरह झुलसा चुकी है, जबकि जिम्मेदार तंत्र जमीनी राहत देने के बजाय केवल आंकड़ों की बाजीगरी में उलझा हुआ है। सरकारी तंत्र महंगाई को थामने में पूरी तरह पंगु साबित हो चुका है, और नीतिगत पंगुता का यह खमियाजा देश का आम नागरिक अपनी खाली होती जेब से चुकाने को मजबूर है।

