पूर्व जज जस्टिस ए.एस. ओका ने न्यायिक व्यवस्था पर उठाए गंभीर सवाल, पारदर्शी रोस्टर की मांग
✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई/नई दिल्ली | उच्चतम न्यायालय की आंतरिक कार्यप्रणाली और मुकदमों के आवंटन को लेकर शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.एस. ओका ने बेहद गंभीर और कड़े सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में देश की सर्वोच्च अदालत पूरी तरह ‘प्रधान न्यायाधीश-केंद्रित’ यानी सीजेआई-सेंट्रिक होकर रह गई है। इस असंतुलन को दुरुस्त करने के लिए मुकदमों को सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया से मानवीय हस्तक्षेप को पूरी तरह समाप्त करना होगा और इसकी जगह एक सख्त व पारदर्शी रोस्टर प्रणाली लागू करनी होगी। न्यायमूर्ति ओका ने शीर्ष अदालत में मामलों के मनमाने आवंटन पर भी चिंता जताई।
कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स के तहत ‘सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की जवाबदेही” विषय पर आधारित चर्चा सत्र में उन्होंने कहा कि कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कोविड-19 महामारी के संकट के दौरान मामलों की स्वचालित लिस्टिंग व्यवस्था को सफलतापूर्वक लागू करके दिखाया था। सुप्रीम कोर्ट को भी उच्च न्यायालयों की तर्ज पर काम करते हुए कंप्यूटर-आधारित ऑटोमेटेड लिस्टिंग की तरफ बढ़ना चाहिए, जिससे मुकदमों को तय करने में किसी भी व्यक्ति विशेष की व्यक्तिगत पसंद या मनमानी की कोई गुंजाइश न रहे।
उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में एक ही कानूनी प्रकृति और श्रेणी के मामले अलग-अलग पीठों के पास चले जाते हैं, जिससे न केवल कानूनी व्याख्याओं में विरोधाभास पैदा होता है, बल्कि आम वादियों के मन में भी हमेशा असमंजस और अविश्वास की स्थिति बनी रहती है।
न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़ी कॉलेजियम प्रणाली पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि जब तक कोई ठोस और बेहतर विकल्प सामने नहीं आता, तब तक इस व्यवस्था को खारिज नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने यह साफ तौर पर स्वीकार किया कि कॉलेजियम के क्रियान्वयन में प्रक्रियात्मक खामियां रही हैं, किंतु इसके आधार पर पूरी व्यवस्था को दोषमुक्त नहीं ठहराया जा सकता। केवल इंटरनेट पर प्रस्तावों के नाम प्रकाशित कर देने को पारदर्शिता नहीं कहा जा सकता, बल्कि वास्तविक पारदर्शिता उस आंतरिक चयन प्रक्रिया में होनी चाहिए जिसके जरिए जजों का चुनाव किया जाता है। इसके साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार की ढुलमुल कार्यशैली को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि कॉलेजियम द्वारा भेजी गई महत्वपूर्ण सिफारिशों को महीनों तक दबाए रखना न्यायिक स्वतंत्रता के लिए घातक है और इस संदर्भ में कार्यपालिका की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
अदालतों द्वारा कुछ खास मुकदमों के निस्तारण के लिए समय-सीमा निर्धारित करने की बढ़ती परिपाटी पर कड़ा ऐतराज जताते हुए न्यायमूर्ति ओका ने इसे साधन-संपन्न और विशेषाधिकार प्राप्त तबके के पक्ष में जाने वाली व्यवस्था करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि जब शीर्ष अदालत किसी एक मामले की सुनवाई छह महीने के भीतर पूरी करने का फरमान जारी करती है, तो संबंधित निचली अदालत या हाईकोर्ट के उस जज के समक्ष वर्षों से कतार में खड़े आम और गरीब वादियों के मुकदमे स्वाभाविक रूप से पीछे छूट जाते हैं। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और प्रशांत भूषण सहित न्यायिक जगत की कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं, जिन्होंने न्यायिक जवाबदेही और प्रक्रियात्मक सुधारों की इस मांग का खुलकर समर्थन किया।
