केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस, 5 नवंबर को अगली सुनवाई
पुनर्विकास के कारण विस्थापित मतदाताओं के नाम कटने का मुद्दा भी उठा
✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई/नई दिल्ली | महाराष्ट्र में SIR के तहत 2.07 करोड़ मतदाताओं के नाम प्रारूप सूची से बाहर होने पर चुनावी घमासान तेज हो गया है। मतदाता सूची से इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मुंबई-पुणे में पुनर्विकास के कारण विस्थापित मतदाताओं के नाम कटने का मुद्दा भी अदालत में उठा। अब 5 नवंबर को होने वाली सुनवाई में निगाहें इस पर रहेंगी कि मतदाता सूची की शुद्धता और मताधिकार की सुरक्षा से जुड़े सवालों पर अदालत क्या रुख अपनाती है।
बता दें कि राज्य के करीब 9.79 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से 2,06,88,487 नाम प्रारूप सूची में शामिल नहीं किए गए हैं। यह कुल मतदाताओं का 21.14 प्रतिशत है। इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर सोमवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, निर्वाचन आयोग और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 5 नवंबर को तय की है।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने दलील दी कि मुंबई और पुणे जैसे शहरों में पुनर्विकास परियोजनाओं के कारण अस्थायी रूप से दूसरी जगह रहने वाले मतदाताओं के नाम भी सूची से बाहर हो सकते हैं। ऐसे मतदाता अपने पुराने पते पर नहीं मिलने के कारण ‘व्यक्ति नहीं मिला’ की श्रेणी में दर्ज किए गए। याचिका में मांग की गई कि अदालत का फैसला आने तक SIR की प्रक्रिया रोकी जाए और पहले की मतदाता सूची में दर्ज किसी भी मतदाता का नाम नहीं हटाया जाए।
सुनवाई में मतदाता रिकॉर्ड की तार्किक विसंगतियों का मुद्दा भी उठा। याचिकाकर्ता की ओर से लगभग 1.22 करोड़ रिकॉर्ड को लेकर सवाल उठाए गए। हालांकि, यह आंकड़ा प्रारूप सूची से बाहर हुए 2.07 करोड़ नामों से अलग है। दोनों संख्याएं अलग-अलग श्रेणियों और प्रक्रियागत सवालों से संबंधित हैं; इन्हें एक ही आंकड़ा नहीं माना जा सकता।
निर्वाचन अधिकारियों के अनुसार, पुनरीक्षण के दौरान जिन मतदाताओं को उनके दर्ज पते पर नहीं पाया जा सका, उनके नाम प्रारूप सूची में शामिल नहीं हुए। ऐसे मतदाताओं के लिए निर्धारित दावा और आपत्ति प्रक्रिया के जरिए नाम शामिल कराने का रास्ता उपलब्ध है। प्रारूप सूची से नाम बाहर होना अपने आप में मतदाता की पात्रता समाप्त होने का अंतिम निर्णय नहीं है।
याचिका में फॉर्म-6 के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाया गया। दातार ने दलील दी कि नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए निर्धारित इस फॉर्म के माध्यम से पहले से सूचीबद्ध मतदाताओं को दोबारा आवेदन करने की स्थिति में कठिनाई हो सकती है। सुनवाई के दौरान अदालत में इस प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर चर्चा हुई।
अदालत ने फिलहाल SIR पर रोक लगाने या सभी हटाए गए नामों को बहाल करने का आदेश नहीं दिया है। अब 5 नवंबर की सुनवाई में संबंधित पक्षों के जवाब और मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण होंगे।
