राष्ट्रीय संस्करण | विशेष खोजी रिपोर्ट
18 साल चले मुकदमे को ‘कंसेंट टर्म्स’ के नाम पर दफनाने की इनसाइड स्टोरी
चार साल तक फाइलों को दबाकर बैठे रहे राजस्व अधिकारी, अब 1984 के रिकॉर्ड और कथित मनी ट्रेल की उच्चस्तरीय फॉरेंसिक जांच की मांग।
✍️ प्रहरी इनवेस्टिगेशन ब्यूरो, मुंबई | मुंबई के सबसे महंगे रियल एस्टेट कॉरिडोर पवई और तिरंदाज की करीब 14.5 एकड़ प्राइम लैंड का विवाद सिर्फ दो पक्षों के बीच ज़मीन की रस्साकशी नहीं, बल्कि इस बात का खुला दस्तावेज़ी सबूत है कि जब रसूख और तंत्र हाथ मिलाते हैं, तो नियम-कायदे महज़ औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। बाज़ार में ₹2,000 करोड़ से अधिक आंकी गई इस ज़मीन (पवई के CTS 6A, 7/1A और तिरंदाज के CTS 20, 22) को लेकर 2020 से 2024 के बीच जो कुछ घटा, वह सरकारी फाइलों की रहस्यमयी चुप्पी, राजस्व महकमे की संदेहास्पद काहिली और पुलिसिया दबाव की ऐसी पटकथा है, जिस पर जवाबदेह हुकूमत को शर्मसार होना चाहिए।
इस सुनियोजित खेल की पहली कड़ी 23 दिसंबर 2020 को गढ़ी गई, जब बिल्डर लॉबी से जुड़ी कंपनी के नाम पर एक संदिग्ध सेल डीड चुपचाप पंजीकृत करा ली गई। आरोप हैं कि ₹2,000 करोड़ की ज़मीन को सरकारी कागज़ों में महज़ ₹400 करोड़ का बताकर कौड़ियों के भाव स्टाम्प ड्यूटी चुकाई गई और खज़ाने को सीधे चपत लगाई गई।
लेकिन असली प्रशासनिक पाखंड 2021 में तब उजागर हुआ, जब ज़मीन के मूल मालिक अजय मोहन ने खुद मुलुंड तहसीलदार के दफ्तर का दरवाज़ा खटखटाया और दो-दो बार लिखित हलफनामा देकर साफ़ कहा कि जिस कथित पावर ऑफ अटॉर्नी के दम पर रजिस्ट्री का यह महल खड़ा किया गया, वह पूरी तरह अनधिकृत और फर्जी है।
कायदे से जिस तहसीलदार को उस वक्त जांच बिठानी चाहिए थी, रजिस्ट्री रद्द कराने की सिफारिश करनी चाहिए थी और राजस्व रिकॉर्ड को सुरक्षित करना चाहिए था, उस दफ्तर ने उनकी शिकायतों को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया। जब करोड़ों की ठगी के दस्तावेज़ी सबूत मेज़ पर मौजूद हों और सरकार का अफ़सर आंखें मूंदकर बैठ जाए, तो यह काहिली नहीं बल्कि मिलीभगत की खुली गवाही बन जाती है।
तहसीलदार की इस रहस्यमयी ‘सेवा’ का असली फल 2024 में काटा गया। सिटी सिविल कोर्ट नंबर 66 में 2006 से यानी पूरे 18 साल से चल रहे मुकदमे को 9 अक्टूबर 2024 को अचानक ‘कंसेंट टर्म्स’ दाखिल कर रफा-दफा कर दिया गया। वादी नंबर 1 अजय मोहन, जिन्होंने 2021 में इसी सौदे को फर्जी बताया था, वे अचानक वादी नंबर 2 और 3 बनीं बिल्डर कंपनियों के साथ एक ही कतार में खड़े दिखे।
सवाल यह है कि जो सौदा 2021 में फर्जी था, वह 2024 में अचानक पावन कैसे हो गया? 18 साल तक मुकदमे का सामना करने वाले उन नौ प्रतिवादियों को किन गुप्त शर्तों और किस ‘अदृश्य भुगतान’ के बूते रातों-रात सुलह की मेज़ पर लाया गया? अब तक इन्हीं 9 प्रतिवादियों ने बिल्डर के खिलाफ सिटी सिविल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक में चुनौती दी थी और जमीन पर अपना हक जताते आए थे।
व्यवस्था का दोहरा चरित्र तब और नंगा हो गया जब इस सौदेबाज़ी के सामने न झुकने वाले प्रतिवादी 4A से 4D व अन्य के खिलाफ सीधे पवई पुलिस स्टेशन में धोखाधड़ी का शिकंजा कस दिया गया। जो ‘सहमति’ की भाषा न समझे, उसके लिए पुलिस का डंडा तैयार रखना हमारे प्रशासनिक तंत्र की पुरानी रवायत रही है।
2020 की संदिग्ध रजिस्ट्री, 2021 में तहसीलदार द्वारा दबाई गई शिकायतें, 2024 की रहस्यमयी अदालती सुलह और उसके फौरन बाद असंतुष्टों पर पुलिस का दबाव- ये चारों कड़ियां चीख-चीखकर कह रही हैं कि यह महज़ संयोग नहीं, बल्कि ज़मीन हड़पने का एक पूरा सिंडिकेट है। इसी बिल्डर ने प्रतिवादियों 4a, 4b, 4c और 4d को 25 लाख – 25 लाख रुपए की डीडी देकर अपने पक्ष में करने का प्रयास भी किया था।
अब सवाल फाइलों पर कुंडली मारकर बैठे उन आला हाकिमों से है कि जब मूल मालिक की आपत्तियां सरकारी अलमारियों में धूल फांक रही थीं, तब वे किस ‘आदेश’ का इंतज़ार कर रहे थे। एक तरफ डिजिटल गवर्नेंस और पारदर्शी जांच का सरकारी ढोल पीटा जाता है, दूसरी तरफ अरबों की ज़मीन पर जब अफ़सरशाही डाकिया बनकर आंखें फेर लेती है, तो यह लोकतंत्र नहीं बल्कि बाबूशाही की बेखौफ सौदेबाज़ी है। जब तक 2020 के मूल्यांकन, तहसीलदार के दबाए गए पत्राचार, 2024 के गुप्त लेन-देन और पुलिसिया भूमिका की एक साथ उच्चस्तरीय फॉरेंसिक और निष्पक्ष जांच नहीं होती, तब तक यह साफ़ है कि इस तंत्र में क़ानून की किताब सिर्फ़ कमज़ोरों के लिए है, रसूखदारों के लिए तो सरकारी दफ्तर ही रजिस्ट्री का बाज़ार बने हुए हैं।

