अमेरिकी संसद के दोनों सदनों पर डेमोक्रेट्स का कब्जा, बेलगाम फैसलों पर लगा कड़ा पहरा
कंसास में 100 साल बाद जीती डेमोक्रेटिक पार्टी, टेक्सास-कैरोलिना के लाल किले ढहे
✍️ विशेष अंतरराष्ट्रीय डेस्क, वाशिंगटन | अमेरिकी मतदाताओं ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एकतरफा नीतियों और बेलगाम मनमाने फैसलों के खिलाफ मध्यावधि चुनाव में जबर्दस्त सत्ता-विरोधी जनादेश दिया है। एसोसिएटेड प्रेस के आधिकारिक नतीजों के मुताबिक, सीनेट में 7 अहम सीटें छीनने और प्रतिनिधि सभा में दो दर्जन से अधिक सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज करने के साथ ही विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के दोनों सदनों पर पूर्ण नियंत्रण हासिल कर लिया है।
बीते दो वर्षों से अपनी अनुकूल संसद के बूते मनमर्जी से फैसले ले रहे राष्ट्रपति ट्रंप के लिए यह नतीजा किसी बड़े सियासी तख्तापलट से कम नहीं है, जहां व्हाइट हाउस में बैठे राष्ट्रपति के पास अब केवल कार्यकारी दस्तखत की औपचारिकता बचेगी, जबकि सत्ता की असली चाबी विपक्षी खेमे के हाथ में चली गई है।
इस सियासी उलटफेर की मुख्य वजह सुपरमार्केट से लेकर पेट्रोल पंपों तक फैली असहनीय महंगाई और रोजमर्रा के आसमान छूते खर्च रहे, जिसने आम अमेरिकी परिवारों की कमर तोड़ दी थी। इसके साथ ही देश को जबरन ईरान युद्ध की आग में झोंकने के राष्ट्रपति के फैसले ने रिपब्लिकन पार्टी के पारंपरिक समर्थकों को भी बगावत के मोड़ पर खड़ा कर दिया। मतदाताओं की नाराजगी के प्रमुख मुद्दों में ईरान के साथ युद्ध और सरकार में भ्रष्टाचार को लेकर चिंताएं भी रही हैं। नतीजे इतने स्तब्ध करने वाले रहे कि कंसास में पूरे एक सदी के लंबे सूखे के बाद किसी डेमोक्रेटिक सीनेटर की जीत हुई, वहीं टेक्सास और दक्षिण कैरोलिना जैसे रिपब्लिकन पार्टी के जन्मजात दुर्ग ढह गए।
कैपिटल हिल के दोनों सदनों पर नियंत्रण के साथ ही अब सभी शक्तिशाली विधायी और जांच समितियों की कमान डेमोक्रेट्स के हाथों में आ गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि ट्रंप प्रशासन के विवादास्पद खर्चों, युद्ध संचालन और एकतरफा नीतियों की अब तीखी व सार्वजनिक संसदीय जांच होगी। संघीय बजट पारित कराने से लेकर न्यायपालिका और शीर्ष प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियों के लिए अब राष्ट्रपति को डेमोक्रेटिक पार्टी की शर्तों के आगे झुकना पड़ेगा। कार्यकारी आदेशों के जरिए हुकूमत चलाने की ट्रंप की ताकत को संसद के इस नए संतुलन ने पंगु बना दिया है।
वाशिंगटन के इस बड़े बदलाव की गूंज वैश्विक व्यापार और भारत-अमेरिका संबंधों पर भी साफ दिखाई देगी। इस बड़े सत्ता परिवर्तन को लेकर नई दिल्ली के नीति-गलियारों में भी असर पड़ेगा। अब तक एकतरफा धमकियों और सोशल मीडिया पोस्ट्स के सहारे चलने वाली ट्रंप की टैरिफ नीति पर अब अमेरिकी संसद का सीधा अंकुश लगेगा। भारतीय निर्यातकों पर मनमाने आयात शुल्क थोपने, रक्षा समझौतों के बजट आवंटन और भारतीय आईटी पेशेवरों की रीढ़ माने जाने वाले एच-1बी वीजा नियमों को मनमर्जी से कसने की व्हाइट हाउस की कोशिशों को अब कैपिटल हिल की मंजूरी से गुजरना होगा। अमेरिकी मतदाताओं ने साफ कर दिया है कि मुल्क की हुकूमत अब किसी की व्यक्तिगत जिद से नहीं, बल्कि संसद के कड़े पहरे में ही चलेगी।
