थाली पर 7.74% महंगाई की मार, सांख्यिकी के छलावे में पिसता आम भारतीय
✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई | सरकारी फाइलों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में गरीबी उन्मूलन का ढोल भले ही जितने जोर-शोर से पीटा जा रहा हो, आम भारतीय की रसोई का सच पूरी तरह इसके उलट है। विश्व बैंक की ताजा ‘इंडिया पॉवर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ’ के आंकड़े बताते हैं कि देश में 2011 में जो गरीबी दर 57.7 फीसदी थी, वह 2023 तक घटकर 16.1 फीसदी रह गई है। कागजों पर दावा है कि करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकल आए और 3 डॉलर प्रतिदिन से कम पर जीने वाली घोर गरीबी भी घटकर महज 2.6 फीसदी बची है।
लेकिन वर्ल्ड बैंक के इस जादुई गणित की असलियत यह है कि यह पूरा आकलन क्रय शक्ति समता (पीपीपी) पर आधारित उपभोग के फॉर्मूलों पर टिका है, जिसका पसीना बहाने वाले मजदूर की वास्तविक दैनिक आय से कोई वास्ता नहीं है। पांच किलो मुफ्त अनाज और न्यूनतम उपभोग के दम पर जिस विशाल आबादी को गरीबी मुक्त घोषित कर दिया गया, वह बाजार पहुंचते ही आटे-दाल के भाव से पस्त हो जाती है।
विकास के इस दावे की कलई ‘वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट’ के तथ्यों ने खोलकर रख दी है। आंकड़े साफ करते हैं कि देश में गरीबी मिटने के बजाय दौलत का ऐसा केंद्रीकरण हुआ है, जिसने आर्थिक विषमता की खाई को और गहरा कर दिया है। आज देश की कुल संपत्ति का 40.1 फीसदी हिस्सा केवल 1 फीसदी अति-धनाढ्यों के पास है। शीर्ष 10 फीसदी रईस देश की 65 फीसदी दौलत पर काबिज हैं, जबकि नीचे की 50 फीसदी आबादी के हिस्से में महज 6.4 फीसदी संपत्ति आती है। राष्ट्रीय आय के बंटवारे में भी यही 10 फीसदी तबका 57.7 फीसदी कमाई समेटे बैठा है, और आधी आबादी के हिस्से महज 15 फीसदी आता है।
कागजों में गरीबी से उबारे गए इसी वर्ग पर महंगाई का सबसे घातक वार हो रहा है। सांख्यिकी मंत्रालय के आंकड़े गवाह हैं कि सितंबर में खुदरा महंगाई 5.54 फीसदी और खाद्य महंगाई 7.74 फीसदी के खतरनाक स्तर पर पहुंच गई। ग्रामीण इलाकों में थाली की महंगाई 8.06 फीसदी का करंट मार रही है। जिस परिवार की 70 फीसदी कमाई सिर्फ रूखी-सूखी रोटी जुटाने में खप जाए, उसके लिए गरीबी घटने के आंकड़े बेमानी हैं। वहीं शहरों में 6.9 फीसदी और पढ़ी-लिखी युवा आबादी में 9.2 फीसदी बेरोजगारी का दंश यह साबित करने के लिए काफी है कि आंकड़ों की चमक के पीछे आम आदमी की बुनियादी परेशानियां जस की तस हैं।
