8 साल तक जिस करार पर अदालत को उलझाए रखा, समझौते में माना – वह तो फर्जी था
✍️ प्रहरी इनवेस्टिगेशन ब्यूरो, मुंबई | मायानगरी मुंबई के सबसे महंगे रियल एस्टेट बेल्ट पवई और तिरंदाज की करीब 14.5 एकड़ प्राइम लैंड (CTS 6A, 7/1A और CTS 20, 22) पर 18 साल तक चले मुकदमे का अचानक हुआ पटाक्षेप केवल एक दीवानी विवाद का निपटारा नहीं है, बल्कि यह दस्तावेजी सबूत है कि कैसे राजस्व दफ्तरों से लेकर अदालत की चौखट तक पूरे सिस्टम को रसूख के दम पर साध लिया गया। रियल एस्टेट मार्केट में 2 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक आंकी जा रही इस बहुमूल्य जमीन पर सिटी सिविल कोर्ट में वर्ष 2006 से ‘सूट नंबर 4962/2006’ लंबित था। लेकिन 9 अक्टूबर 2024 को कोर्ट नंबर 66 में जो कुछ रिकॉर्ड पर दर्ज हुआ, उसने सीधे तौर पर न्यायिक शुचिता और कानून के इकबाल को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
अदालत में उस दिन वादी पक्ष और चुनिंदा प्रतिवादियों की मिलीभगत से ‘Exhibit-173’ के तहत कंसेंट टर्म्स (सहमति की शर्तें) पेश की गईं और 18 साल पुराना मुकदमा एक झटके में वापस ले लिया गया। इस तथाकथित समझौते की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि मुकदमे का मुख्य चेहरा यानी मूल वादी नंबर 1 अजय मोहन खुद अदालत के कठघरे में मौजूद तक नहीं हुआ। उसकी गैर-मौजूदगी में बिल्डर निरंजन हीरानंदानी ने एक कथित सहमति पत्र और 9 चुनिंदा प्रतिवादियों के दस्तखत लेकर एक ऐसा समझौता दाखिल कराया गया।
इस कंसेंट लेटर में खुद हस्ताक्षरकर्ताओं ने लिखित हलफनामा देकर यह कबूल कर लिया कि जिस 23 अक्टूबर 1969 के ‘एग्रीमेंट फॉर सेल’ के दम पर 2006 से मुकदमा लड़ा जा रहा था, वह शुरू से ही कानूनी रूप से शून्य (void ab initio) था। समझौते में यह भी स्वीकार किया गया कि करार के वक्त वादी नाबालिग था, उसने कोई दस्तखत नहीं किए थे और उसे कोई प्रतिफल राशि नहीं मिली थी।
ऐसे में कानून का बुनियादी सवाल यही है कि अगर 1969 का वह इकरारनामा अस्तित्वहीन और फर्जी था, तो 18 साल तक किसकी शह पर झूठी प्लीडिंग्स, झूठे हलफनामे और बनावटी साक्ष्य पेश कर अदालत का कीमती समय बर्बाद किया गया? यह सीधे तौर पर सीआरपीसी की धारा 340 के तहत अदालत की आंखों में धूल झोंकने और झूठी गवाही (Perjury) का खुला आपराधिक मामला बनता है।

इस आपराधिक सिंडिकेट की कार्यप्रणाली का पर्दाफाश उस समय होता है, जब 2020 और 2021 के आधिकारिक रिकॉर्ड को खंगाला जाए। 23 दिसंबर 2020 को, जब मुकदमा विचाराधीन था- बिल्डर निरंजन हीरानंदानी से जुड़ी कंपनी के पक्ष में इसी विवादित जमीन की सेल डीड गुपचुप तरीके से पंजीकृत करवा ली गई। 2,000 करोड़ रुपए की जमीन को कागजों पर महज 400 करोड़ रुपए का दिखाकर मात्र 8.5 लाख रुपये की कौड़ियों के भाव स्टांप ड्यूटी चुकाई गई।
इसके ठीक बाद, यानी वर्ष 2021 में इसी वादी नंबर 1 अजय मोहन ने मुलुंड तहसीलदार के दफ्तर में दो बार लिखित शिकायत दर्ज कराई थी कि बिल्डर निरंजन हीरानंदानी ने उसकी जमीन की फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी बनाकर अवैध सौदा किया है। लेकिन तहसीलदार के दफ्तर ने उस वक्त उन गंभीर शिकायतों को अलमारियों में दबा दिया। इतना ही नहीं,प्रतिवादी 4a–4d ने राजस्व विभाग, बीएमसी तथा नगर विकास विभाग के पास भी शिकायतें दर्ज कराई थी, RTI से जांच पड़ताल करने की गुहार लगाई थी, लेकिन किसी भी विभाग और अधिकारी ने जांच की जहमत नहीं उठाई।
सवाल यह भी उठता है कि जिस सौदे को 2021 में वादी खुद सरकारी दफ्तर में फर्जी बता रहा था, 2024 में उसी बिल्डर के इशारे पर तैयार ‘कंसेंट टर्म्स’ में वादी की भौतिक गैर-मौजूदगी के बावजूद अदालत ने बिना किसी क्रॉस-वेरिफिकेशन के फाइल बंद कैसे कर दी? कैसे 2006 में दायर मुकदमे को वापस लेने की इजाजत दे दी?
इस पूरे खेल का सबसे स्याह पहलू यह है कि मुकदमे के फैसले से पहले ही जमीन पर बिल्डर के निजी सुरक्षाकर्मियों और बाउंसरों की तैनाती कर दी गई थी, ताकि 18 अप्रैल 1984 के वैध म्यूटेशन आदेश के तहत प्रॉपर्टी कार्ड में दर्ज मूल दावेदारों और प्रतिवादियों को जबरन बेदखल रखा जा सके। जब इस संदिग्ध समझौते पर दस्तखत करने से प्रतिवादी 4A, 4B, 4C और 4D ने इनकार कर दिया, तो उनके खिलाफ पवई थाने की पुलिस का इस्तेमाल कर फर्जी मुकदमों और दबाव का तंत्र सक्रिय कर दिया गया।
अब गैर-हस्ताक्षरकर्ता प्रतिवादी 4A से 4D ने इस पूरे कॉरपोरेट-प्रशासनिक गठजोड़ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अदालत से उन्होंने इस मामले का संज्ञान लेते हुए मांग की है कि 1984 के वैध प्रॉपर्टी कार्ड, 2020 की संदिग्ध स्टांप चोरी, 2021 में तहसीलदार, नगर विकास विभाग और बीएमसी के सामने की गई प्रति तथा खुद वादी नंबर 1 द्वारा मुलुंड तहसीलदार के समक्ष की शिकायतों और 2024 में वादी की अनुपस्थिति में दर्ज कराई गई कंसेंट टर्म्स की एक साथ उच्चस्तरीय विशेष जांच दल (SIT) से निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही, 18 साल तक अदालत से बोले गए झूठ के लिए जिम्मेदार लोगों पर आपराधिक मुकदमा चलाया जाए, ताकि यह साफ हो सके कि कानून का राज कागजों तक सीमित है या अरबों की जमीन के सौदेबाजों पर भी लागू होता है।
