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सेना का सम्मान या सत्ता का प्रचार: 1965 और 1971 की विरासत आज क्यों प्रासंगिक?

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✍🏻 प्रहरी विशेष संवाददाता, नई दिल्ली।
भारतीय सेना की वीरता देश की साझी धरोहर है, मगर क्या इसका इस्तेमाल सियासी चमक के लिए होना चाहिए? यह सवाल आज फिर गूंज रहा है, जब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की कामयाबी के बाद रैलियां, रोड शो और सियासी नारे गूंज रहे हैं।

1965 और 1971 के युद्धों में भारत ने पाकिस्तान को धूल चटाई, लेकिन तत्कालीन सरकारों ने सैनिकों की शहादत को वोट की तिजोरी में नहीं बदला। आज की तस्वीर उलट है—सैनिकों की वीरता के पीछे सत्ता का प्रचार चमक रहा है। इतिहास के पन्ने इस बदलाव की कहानी बयां करते हैं।

1965: शास्त्री का संयम, सेना का पराक्रम

1965 में पाकिस्तान की घुसपैठ को भारतीय सेना ने करारा जवाब दिया। टैंकों की जंग में हाजीपीर और लाहौर तक भारत का परचम लहराया। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा देकर देश को जोड़ा, मगर विजय को सियासी मंच पर नहीं चढ़ाया। न रैलियां हुईं, न पोस्टर लगे। ताशकंद समझौते में शास्त्री ने शांति को चुना, प्रचार को नहीं। सेना का सम्मान दिल्ली के दरबार में नहीं, जवानों के हौसले में बस्ता था।

1971: इंदिरा का नेतृत्व, सैनिकों का श्रेय

1971 का युद्ध भारत के सैन्य इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में भारतीय सेना ने 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को घुटनों पर ला दिया। इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’ कहा गया, मगर यह जनता और विपक्ष की आवाज थी, न कि सरकारी प्रचार का हिस्सा। विजय दिवस सैनिकों के सम्मान तक सीमित रहा। इंदिरा ने फील्ड मार्शल मानेकशॉ और जवानों को पूरा श्रेय दिया, सत्ता की चमक को पीछे रखा।

आज: सैन्य शौर्य पर सियासी रंग

‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता के बाद तस्वीर बदली है। रैलियों और प्रचार अभियानों में सैन्य विजय को सियासी हथियार बनाया जा रहा है। 1999 के कारगिल युद्ध में भी यही शुरू हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने विजय को ‘विजय दिवस’ के रूप में मनाया, मगर खुफिया चूक का सवाल अनुत्तरित रहा। सेना ने दुर्गम पहाड़ियों पर जीत हासिल की, लेकिन सत्ता माला पहनाने तक सीमित रही। आज भी यही सवाल गूंजता है—क्या सेना की वीरता सियासी मंच की सजावट बन रही है?

1965 और 1971 में सरकारों ने सेना को सम्मान दिया, प्रचार की भूख नहीं दिखाई। आज जब सैन्य शौर्य पर सियासी रंग चढ़ रहा है, इतिहास याद दिलाता है—सेना की वीरता देश की है, किसी दल की नहीं। सैनिकों का सम्मान तिरंगे में बस्ता है, न कि वोट की तिजोरी में।


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