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दल-बदल: एजेंसियों का खौफ और सत्ता का ‘वॉशिंग मशीन’ मॉडल

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✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई | हाल ही में आम आदमी पार्टी को राज्यसभा में बड़ा झटका लगा है। राघव चड्ढा समेत सात सांसदों के बीजेपी में जाने से पार्टी की संख्या घटकर तीन रह गई है। संजय सिंह ने दलबदल विरोधी कानून के तहत इनकी सदस्यता खत्म करने की लड़ाई छेड़ दी है।

बता दें कि 10वीं अनुसूची का मूल उद्देश्य दल-बदल पर लगाम लगाना था, लेकिन आज यह कानून विपक्ष को खत्म करने, सरकारों को गिराने और बनाने का सबसे सटीक औजार बन गया है। 2014 से 2026 के बीच दल-बदल की प्रक्रिया का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है, जिसमें केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका सबसे अहम हो गई है। जब भी किसी विपक्षी नेता पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगते हैं और ईडी, सीबीआई या आयकर विभाग का शिकंजा कसता है, तब उस नेता के सामने दो ही रास्ते बचते हैं। या तो जेल की सलाखें या फिर भाजपा का दामन थामना। जैसे ही नेता भाजपा में शामिल होता है, जांच की रफ्तार सुस्त पड़ जाती है या फाइलें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं। इसी पैटर्न को राजनीतिक गलियारों में ‘वॉशिंग मशीन’ कहा जा रहा है।

​महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में सरकारें पलटने का तरीका एक जैसा ही रहा है। सबसे पहले एजेंसियों के जरिए दबाव बनाया जाता है, फिर विधायकों को तोड़कर ‘दो-तिहाई’ का जादुई आंकड़ा जुटाया जाता है, और अंत में विधानसभा अध्यक्ष इस पूरे घटनाक्रम को ‘विलय’ यानी ‘मर्जर’ की कानूनी मान्यता दे देते हैं।

इस खेल में स्पीकर की भूमिका सबसे अधिक विवादास्पद रही है। वे संवैधानिक रूप से निष्पक्ष होने के बजाय सत्ताधारी दल के एजेंट की तरह काम करते दिखते हैं। अयोग्यता याचिकाओं पर महीनों तक सुनवाई न करना या उन्हें लटकाए रखना भाजपा की सरकार बचाने का सबसे बड़ा जरिया बन गया है।

आज 10वीं अनुसूची का मतलब दलीय अनुशासन नहीं, बल्कि विपक्ष को नेस्तनाबूद करने की सरकारी रणनीति है। भाजपा ने कानून की इस तकनीकी खामी और एजेंसियों के खौफ का ऐसा घालमेल तैयार किया है कि दलबदल अब लोकतंत्र का अपमान नहीं, बल्कि सत्ता का एक संगठित ऑपरेशन बन चुका है।


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