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रियल एस्टेट का ‘ब्लैक होल’: चीन में घर खरीदार कंगाल, क्या भारतीय बाजार को भी लगेगा मंदी का करंट?
✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई | चीन के रियल एस्टेट सेक्टर में आया ‘स्लो-मोशन क्रैश’ 2026 के मध्य तक अपने सबसे भयावह दौर में पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार चीन में आवासीय संपत्तियों की कीमतें मुद्रास्फीति के समायोजन के बाद वर्ष 2005 के स्तर तक गिर चुकी हैं। ड्रैगन की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले इस सेक्टर का यह पतन अब भारतीय बाजारों और सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस का केंद्र बन गया है कि क्या भारत में भी संपत्तियों के दाम दो दशक पुराने स्तर पर वापस आएंगे।
चीन के इस संकट की मुख्य वजह अंधाधुंध निर्माण और उसके बाद मांग में आई भारी कमी को माना जा रहा है। एवरग्रांडे और कंट्री गार्डन जैसी दिग्गज कंपनियों के कर्ज में डूबने के बाद चीन के 70 प्रमुख शहरों में कीमतें लगातार गिर रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2025 के अंत तक चीन में बिना बिके तैयार मकानों का क्षेत्रफल बढ़कर 391 मिलियन वर्ग मीटर पहुंच गया है जो 2021 के मुकाबले 72 प्रतिशत अधिक है।
चीन के रियल एस्टेट बाजार में मची भारी उथल-पुथल के बीच भारतीय बाजार की स्थिति काफी स्थिर और नियंत्रित नजर आ रही है। चीन में जहां ओवरसप्लाई ने कीमतों को रसातल में भेज दिया है वहीं भारत के प्रमुख सात शहरों में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। वर्ष 2026 की पहली तिमाही के नवीनतम आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि भारतीय बाजार में बिना बिके मकानों का प्रबंधन काफी प्रभावी ढंग से किया जा रहा है।
मौजूदा डेटा के अनुसार भारत के सात प्रमुख महानगरों मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद, चेन्नई और कोलकाता में कुल अनसोल्ड इन्वेंटरी का आंकड़ा लगभग 5.8 लाख से 6.1 लाख यूनिट्स के बीच बना हुआ है। यदि इसकी तुलना इन्वेंटरी ओवरहांग यानी स्टॉक खत्म होने में लगने वाले संभावित समय से की जाए तो यह भारतीय बाजार की मजबूती को दर्शाता है। वर्तमान में भारतीय शहरों में यह अवधि घटकर मात्र 14 से 16 महीने रह गई है जबकि चीन में इन्वेंटरी ओवरहांग कई वर्षों तक फैला हुआ है।
शहरवार विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि मुंबई महानगर क्षेत्र और दिल्ली-एनसीआर में कुल इन्वेंटरी का सबसे बड़ा हिस्सा मौजूद है। हालांकि इन दोनों बड़े बाजारों में पिछले कुछ समय से नई लॉन्चिंग को लेकर डेवलपर्स ने काफी सतर्कता बरती है। बाजार की मांग को समझते हुए नई परियोजनाओं की शुरुआत सीमित रखी गई है जिससे स्टॉक में स्थिरता आई है और मांग व आपूर्ति का संतुलन बना हुआ है। बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे दक्षिण भारतीय बाजारों में भी आईटी सेक्टर की मांग के चलते इन्वेंटरी तेजी से खप रही है।
भारत में रेरा जैसे सख्त नियमों के प्रभाव और निर्माण लागत में लगातार हो रही वृद्धि के कारण कीमतों में चीन जैसी किसी बड़ी गिरावट की संभावना को बाजार विशेषज्ञ सिरे से खारिज कर रहे हैं। भारत का रियल एस्टेट ढांचा इस समय इन्वेस्टर ड्रिवेन होने के बजाय एंड-यूजर ड्रिवेन है यानी लोग निवेश के बजाय रहने के उद्देश्य से घर खरीद रहे हैं।
बाजार के जानकारों का कहना है कि भारत में प्रॉपर्टी के दाम 2006 के स्तर पर जाने की संभावना तकनीकी और आर्थिक रूप से शून्य के बराबर है। पिछले 20 वर्षों में सीमेंट, स्टील और लेबर जैसी निर्माण लागत में कई गुना वृद्धि हुई है।
इसके अलावा भारत में रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी के आने के बाद बिल्डरों द्वारा बाजार में सप्लाई को नियंत्रित किया गया है। चीन में जहां आबादी घटने और घरों की अधिकता ने संकट पैदा किया वहीं भारत में शहरीकरण की तीव्र गति और मिडिल क्लास की बढ़ती संख्या के कारण एंड-यूजर डिमांड अभी भी सप्लाई से आगे चल रही है।
भारत के बैंक भी होम लोन और रियल एस्टेट फंडिंग को लेकर चीन के बैंकों की तुलना में अधिक सख्त मानदंडों का पालन कर रहे हैं जिससे बाजार में कृत्रिम तेजी की गुंजाइश कम है। फिलहाल भारतीय रियल एस्टेट में गिरावट की आशंका महज 5 से 10 फीसदी के बीच आंकी जा रही है जो कि चीन के क्रैश के मुकाबले बेहद कम है।
