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‘सूट-बूट’ वालों की तिजोरी भर रही एथेनॉल नीति; चीनी-शराब मिलों को बंपर मुनाफा, जनता को सिर्फ महंगाई!

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  • ‘ग्रीन फ्यूल’ के प्रोपेगेंडा में फूंका जा रहा गरीबों का निवाला

  • 1 लीटर ईंधन के लिए 3,500 लीटर पानी स्वाहा

  • ईंधन ब्लेंडिंग या खाद्य सुरक्षा से खिलवाड़? गन्ने के रस और अनाज के डायवर्जन से बढ़ा संकट, आंकड़ों में देखें पूरा गणित

✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई / नई दिल्ली | प्रदूषण नियंत्रण, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और कच्चे तेल के आयात में कमी के नाम पर लागू की गई एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति अब बड़े नीतिगत विवाद के केंद्र में आ गई है। पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को 1.5% से बढ़ाकर 20% तक पहुंचाने के बाद केंद्र सरकार अब इसे 85% तक ले जाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। लेकिन इस महत्वाकांक्षी नीति पर कॉर्पोरेट हितों को बढ़ावा देने के आरोप तेज हो गए हैं।

आलोचकों का कहना है कि सरकारी प्रचार में इसे हरित ईंधन क्रांति के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि वास्तविक लाभ प्रभावशाली शक्कर मिलों, निजी डिस्टिलरी प्लांट्स और उनसे जुड़े बड़े कारोबारी समूहों को मिल रहा है। सरकारी तेल कंपनियों आईओसीएल और बीपीसीएल को तय कीमतों पर एथेनॉल खरीदने की कानूनी बाध्यता ने इन उद्योगों के लिए जोखिम-मुक्त बाजार तैयार कर दिया है। इससे मिल मालिकों को भुगतान अटकने या बाजार में उतार-चढ़ाव का खतरा लगभग समाप्त हो गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सवाल अब केवल पर्यावरण या ऊर्जा सुरक्षा का नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या यह नीति किसानों और उपभोक्ताओं के बजाय चुनिंदा कॉर्पोरेट घरानों के आर्थिक हितों को मजबूत कर रही है।

इस तथाकथित पर्यावरण-अनुकूल ‘हरित ईंधन’ का सबसे भयावह पहलू देश के प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ रहा बेहिसाब दबाव है। आंकड़ों के मुताबिक, महज 1 लीटर एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने की खेती में ही औसतन 2,500 से 3,500 लीटर पानी की भारी बर्बादी होती है। इसके बाद डिस्टिलरी के भीतर इंडस्ट्रियल प्रोसेसिंग में भी प्रति लीटर 4 से 10 लीटर साफ पानी अलग से स्वाहा हो जाता है।

गन्ने की इस बेकाबू खेती के कारण उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे सर्वाधिक एथेनॉल मिलों वाले राज्यों का ग्राउंडवाटर स्तर खतरनाक रूप से पाताल में जा चुका है। पानी की इस बर्बादी के बाद जो ईंधन तैयार होता है, उसकी ऊर्जा क्षमता शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले 33% कम होती है, जिससे गाड़ियों का माइलेज सीधे तौर पर घट रहा है और इंजन व पाइपलाइनों में जंग लगने का खतरा बढ़ गया है।

इस खेल का सबसे जनविरोधी हिस्सा तब शुरू हुआ, जब सरकार ने एथेनॉल उत्पादन को सिर्फ चीनी मिलों के अंतिम अवशिष्ट ‘C-हैवी मोलासेस’ (लागत ₹56 से ₹60 प्रति लीटर) तक सीमित नहीं रखा। मिल मालिकों के बेकाबू मुनाफे को और बढ़ाने के लिए नीति में फेरबदल कर ताजा गन्ने का रस (लागत ₹65 से ₹69 प्रति लीटर) और मक्का या क्षतिग्रस्त अनाज (लागत ₹64 से ₹71 प्रति लीटर) को सीधे एथेनॉल में बदलने की खुली छूट दे दी गई। इसके लिए भारतीय खाद्य निगम के गोदामों से मिलने वाले सब्सिडी वाले चावल और मक्के को भी इसमें झोंक दिया गया।

जब बाजार में चीनी के दाम कम होते हैं, तो मिलें गन्ने के रस को चीनी बनाने के बजाय सीधे एथेनॉल बनाने में डाइवर्ट कर देती हैं, जिससे बाजार में चीनी की सप्लाई नियंत्रित रहती है और उसके दाम आम जनता के लिए ऊंचे बने रहते हैं। यानी मिल मालिकों के दोनों हाथों में लड्डू हैं।

इस पूरे ‘ग्रीन प्रोपेगेंडा’ का खोखलापन इस बात से भी साफ होता है कि देश में सौर क्षमता को 2.5 GW से बढ़ाकर 150+ GW करने का ढिंढोरा तो पीटा गया, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि देश में लगे 80% से अधिक सोलर पैनल और सेल आज भी सीधे चीन से आयात किए जा रहे हैं।

‘मेक इन इंडिया’ का नारा लगाने वाली सरकार ने घरेलू उद्यमियों को दरकिनार कर पिछले कुछ सालों में चीन की कंपनियों की जेबें भरने के लिए अरबों डॉलर बाहर भेज दिए हैं। यही आत्मघाती मॉडल एथेनॉल क्षेत्र में भी लागू है, जहां शराब बनाने वाले प्लांट जिनके पास पहले से अल्कोहल बनाने का इंफ्रास्ट्रक्चर था, उन्हें भारी सब्सिडी, सस्ते लोन और टैक्स में छूट देकर रसूखदार नेताओं के अपने शक्कर कारखानों और डिस्टिलरी प्लांट्स को सीधे अरबों रुपये का फायदा पहुंचाया जा रहा है।

 


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