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साइबर  जालसाजों के सॉफ्ट टारगेट बने 59% भारतीय

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  • धोखाधड़ी की दर में गिरावट के बावजूद वित्तीय नुकसान में भारत दुनिया से आगे

  • भारतीयों को औसतन ₹2.04 लाख की लग रही चपत

  • साल 2020 में जहां देश में 50,000 मामले थे, वहीं 2025 तक आंकड़ा 5 लाख के पार

✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई | भारतीय डिजिटल उपभोक्ताओं के लिए एक बेहद चौंकाने वाली और सतर्क करने वाली खबर है। देश में मोबाइल नंबर सत्यापन से लेकर साइबर इंटेलिजेंस के बड़े-बड़े दावों के बीच डिजिटल धोखाधड़ी (Digital Fraud) के मामले कागजों पर भले ही लगभग आधे (13.1% से घटकर 7.1%) रह गए हों, लेकिन ठगों द्वारा भारतीयों को कंगाल बनाने की रफ्तार दुनिया में सबसे तेज है। NCRB और ट्रांसयूनियन की संयुक्त पड़ताल में चौंकाने वाला सच सामने आया है। साल 2020 में जहां देश में 50,000 मामले थे, वहीं 2025 तक आंकड़ा 5 लाख के पार हो गया। 

साख की जानकारी देने वाली वैश्विक संस्था ‘ट्रांसयूनियन’ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, ठगी का शिकार होने वाले भारतीयों को होने वाला वित्तीय नुकसान वैश्विक औसत से 36 प्रतिशत अधिक दर्ज किया गया है, जो देश के बैंकिंग और डिजिटल सुरक्षा ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

वैश्विक औसत से बड़ी चपत, पर मामलों की दर आधी हुई

आधिकारिक आंकड़ों की जुबानी समझें तो पिछले एक साल में डिजिटल ठगी का शिकार हुए एक भारतीय को औसतन 2,265 अमेरिकी डॉलर (करीब ₹2.04 लाख) का भारी-भरकम आर्थिक नुकसान हुआ है। इसके विपरीत, वैश्विक स्तर पर यह नुकसान औसतन महज 1,671 डॉलर (करीब ₹1.50 लाख) ही रहा।

आंकड़ों का खतरनाक ग्राफ

साल 2020-21: महामारी के दौर में डिजिटल लेनदेन बढ़ने के साथ ही देश में साइबर अपराधों का आंकड़ा करीब 50,035 दर्ज मामलों पर था, जिसमें कुल वित्तीय चपत करीब ₹1,500 करोड़ के आसपास आंकी गई थी।
साल 2022-23: यह वह दौर था जब यूपीआई और डिजिटल बैंकिंग के विस्तार के साथ मामले तेजी से उछलकर 65,893 (आधिकारिक एफआईआर) पर पहुंच गए, जबकि नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल पर दर्ज शिकायतों का आंकड़ा 10 लाख को पार कर गया, जिसमें अनुमानित ₹5,000 करोड़ से अधिक की चपत लगी।
साल 2024-25: ट्रांसयूनियन की ताजा ‘H1 2026 टॉप फ्रॉड ट्रेंड्स रिपोर्ट’ गवाह है कि भारत में संदिग्ध डिजिटल लेनदेन की दर जो साल 2024 में 13.1% के खतरनाक स्तर पर थी, वह 2025 में सुधरकर 7.1% पर तो आ गई, लेकिन दर्ज मामलों की कुल संचयी संख्या 5 लाख (क्रिमिनल केसेज) को पार कर चुकी है।

फ़िशिंग, विशिंग और स्मिशिंग: इन हथकंडों से खाली हो रहे बैंक खाते

अगस्त से दिसंबर 2025 के बीच किए गए इस सर्वे में 59 प्रतिशत भारतीयों ने स्वीकार किया कि उन्हें डिजिटल ठगी के लिए सीधे तौर पर टारगेट किया गया था। इनमें से 13 प्रतिशत लोग वास्तव में जालसाजों के बिछाए जाल में फंस गए और अपनी गाढ़ी कमाई गंवा बैठे, जबकि वैश्विक स्तर पर वास्तव में ठगे जाने वाले लोगों का यह आंकड़ा सिर्फ 10 प्रतिशत था।

रिपोर्ट के अनुसार, भारतीयों को कंगाल बनाने के लिए ठग सबसे ज़्यादा फ़िशिंग (फर्जी ई-मेल/वेबसाइट), विशिंग (फोन कॉल पर बैंक अधिकारी बनकर ओटीपी पूछना) और स्मिशिंग (लॉटरी या रिवॉर्ड के फर्जी एसएमएस) जैसे हथकंडों का इस्तेमाल कर रहे हैं। तकनीक के इस दौर में यह आंकड़े गवाह हैं कि जागरूकता की कमी के कारण भारतीय उपभोक्ता आज भी साइबर अपराधियों के लिए सॉफ्ट टारगेट बने हुए हैं।


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