लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में जनता का आक्रोश कभी रातों-रात नहीं पनपता। यह लंबे समय से उपेक्षित चिंताओं, बेरोजगारी, प्रशासनिक बेरुखी और संस्थागत संवादहीनता की स्वाभाविक परिणति होता है। हालिया दौर में सामाजिक-राजनीतिक चेतना के स्वरूप में जो बड़ा बदलाव आया है, वह केवल आंदोलन के तरीकों का नहीं, बल्कि प्रतिरोध के दर्शन का है। जब पारंपरिक माध्यम और औपचारिक तंत्र आम जन की समस्याओं को सुलझाने में निष्प्रभावी साबित होने लगते हैं, तब समाज अपनी बात पहुँचाने के लिए नए, तीखे और अनपेक्षित रास्तों का चुनाव करता है।
जंतर-मंतर पर हालिया आंदोलनों के दौरान एक अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिला। लाखों युवाओं (जेन-जी) की अनुशासित और अहिंसक मौजूदगी के बीच उनके नारों, बयानों और पोस्टरों में सत्ता के खिलाफ तीखा आक्रोश और बेबाक भाषा दिखाई दे रही थी। जब नई पीढ़ी अपनी हताशा को व्यक्त करने के लिए भाषा की स्थापित मर्यादाओं को तोड़ती दिखती है, तो इसे केवल ‘अमर्यादित’ कहकर खारिज करने के बजाय इस आक्रोश के गहरे समाजशास्त्र को समझना जरूरी हो जाता है।
भारतीय समाज और संस्कृति में भाषा के अनगढ़ रूपों का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसे दो श्रेणियों में देखा जा सकता है-‘आत्मीयता की भाषा’ और ‘सत्ता व नफरत की भाषा’। हमारे लोक-जीवन में विवाह के ‘गारी’ गीतों, होली के फाग और कबीर की साखियों में हास-परिहास की भाषा बुनी गई है, जो वर्ग और जाति की दीवारों को तोड़कर रिश्तों को करीब लाती है।
इसके ठीक विपरीत, ‘नफरत की भाषा’ सत्ता के अहंकार, ऊंच-नीच और वर्ग-भेद से जन्म लेती है। थानों में पुलिस का रवैया हो या सत्ताधारी वर्ग द्वारा कमजोरों पर दबाव बनाने की कोशिश, यह भाषा एक प्रकार की ‘सांस्कृतिक हिंसा’ का रूप ले लेती है, जिसका मकसद दूसरे को नीचा दिखाना और डराना होता है।
जंतर-मंतर पर युवाओं के बयानों में दिखा तीखापन वास्तव में दमनकारी व्यवस्था और भविष्य की अनिश्चितता से जन्मा वही प्रतिरोध है। यह बिना किसी शारीरिक हिंसा के अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने का एक नया तरीका है।
हालांकि, इस कड़वे सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि हमारी अधिकांश पारंपरिक गालियां पितृसत्तात्मक मानसिकता और स्त्रियों को नीचा दिखाने पर आधारित हैं, जिन्हें बदला जाना बेहद जरूरी है। एक सभ्य समाज की मांग यही है कि लैंगिक द्वेष, नफरत और सत्ता की धौंस वाली भाषा पूरी तरह समाप्त हो। लेकिन जब तक समाज में विषमता, अन्याय और शासक-शासित के बीच का फासला कायम रहेगा, तब तक व्यवस्था के खिलाफ जनता के गुस्से में यह तल्खी और आक्रामकता झलकती रहेगी।
