अदालत में फुसफुसाए 2G-कोलगेट के गुब्बारे, जिन्हें बताया ‘माफिया’ उन्हें ही पहनाई भाजपा की माला!
विशेष राजनीतिक रिपोर्ट
✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई / नई दिल्ली |
2014 के लोकसभा चुनाव में UPA सरकार के कथित ‘महाघोटालों’ का ढोल पीटकर और ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ का सपना दिखाकर सत्ता के सिंहासन पर बैठी भारतीय जनता पार्टी का सबसे बड़ा राजनीतिक नैरेटिव अब पूरी तरह ताश के पत्तों की तरह ढह चुका है।
पिछले 12 साल के शासन के बाद जब UPA काल के इन मामलों का ब्योरा खंगाला जाता है, तो भाजपा सरकार की प्रशासनिक, कानूनी और नैतिक विफलता का एक ऐसा दस्तावेज सामने आता है जिसने केंद्रीय जांच एजेंसियों की साख पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिया है। जिस भ्रष्टाचार विरोध को भाजपा ने अपना सबसे बड़ा ‘ब्रांड’ बनाया था, वह अदालतों की चौखट पर आते-आते हवा-हवाई साबित हुआ और राजनीति के अखाड़े में आते-आते महज दलबदल कराने की ‘वाशिंग मशीन’ बनकर रह गया।
अदालती कसौटी पर फ्लॉप शो: न सबूत मिले, न बड़े घोटाले साबित हुए
जिन मामलों को देश का सबसे बड़ा वित्तीय अपराध बताकर भाजपा ने जनता का वोट बटोरा था, उनमें से अधिकांश आरोप अदालत में ताश के पत्तों की तरह बिखर गए। CAG की रिपोर्ट के आधार पर 2G स्पेक्ट्रम में 1.76 लाख करोड़ रुपए के नुकसान का ढोल पीटा गया था, लेकिन 2017 में सीबीआई की विशेष अदालत ने साफ कहा कि छह साल तक अफवाहें फैलाई गईं और अदालत में एक भी आपराधिक सबूत पेश नहीं किया जा सका, जिसके बाद ए. राजा और कनिमोझी समेत सभी आरोपी बाइज्जत बरी हो गए।
इसी तरह, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर कोयला आवंटन मामले में लगाए गए आरोपों पर सीबीआई ने खुद अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सभी आरोपों से पूरी तरह मुक्त कर दिया। इसके अलावा, एअर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस विलय मामले में 2024 में सीबीआई ने चुपचाप कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर मान लिया कि कोई आपराधिक साजिश हुई ही नहीं थी, जबकि मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस धमाकों में ‘भगवा आतंकवाद’ को लेकर किए गए दावे भी अदालती ट्रायल में साक्ष्यों के अभाव में खारिज हो गए।
‘वॉशिंग मशीन’ मॉडल: जिनसे नफरत का दावा था, उन्हीं से सजाया अपना कुनबा
भाजपा सरकार की सबसे बड़ी नैतिक विफलता का प्रमाण यह है कि जिन नेताओं को भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने ‘भ्रष्टाचार का प्रतीक’ बताया था, सत्ता में आने के बाद उन्हें ही भाजपा का अंगवस्त्र पहनाकर बड़े पदों से नवाजा गया। आदर्श हाउसिंग घोटाले के आरोपी पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को कांग्रेस से लाकर भाजपा ने सीधे राज्यसभा का सांसद बना दिया।
कोयला आवंटन घोटाले के आरोपी नवीन जिंदल को 2024 में भाजपा में शामिल कर तुरंत लोकसभा का टिकट देकर सांसद बना दिया गया।
70 हजार करोड़ के सिंचाई घोटाले के आरोपी अजित पवार से बगावत कराकर महाराष्ट्र में भाजपा-एनडीए सरकार का उपमुख्यमंत्री बना दिया गया। प्रफुल्ल पटेल के केस में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होते ही वे एनडीए के प्रमुख चेहरा बन गए, जबकि असम में शारदा और लुईस बर्जर घोटाले के आरोपी रहे हेमंत बिस्वा सरमा को कांग्रेस से लाकर सीधे राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया गया।
अफ़सरों की बलि, लेकिन राजनीतिक आका महफ़ूज़: एजेंसियों की साख का दिवाला
इस पूरी कवायद में यदि किसी को सजा मिली भी, तो वे केवल सेवामुक्त हो चुके कुछ बुजुर्ग नौकरशाह थे, जैसे पूर्व कोयला सचिव एच. सी. गुप्ता, जो आज भी निचली अदालतों के फैसलों के खिलाफ जमानत पर कानूनी अपीलें लड़ रहे हैं। सीबीआई और ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसियों, जिन्हें कभी स्वायत्त संस्था माना जाता था, उनका इस्तेमाल केवल राजनीतिक विरोधियों की घेराबंदी और उन्हें अपनी पार्टी में शामिल कराने के हथियार के रूप में किया गया। जैसे ही कोई विपक्षी नेता भाजपा के पाले में आया, उसके खिलाफ जारी जांच या तो ठंडे बस्ते में डाल दी गई या फिर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर फाइलें बंद कर दी गईं। यह पूरा घटनाक्रम साबित करता है कि भाजपा का ‘भ्रष्टाचार विरोधी अभियान’ कोई नैतिक संकल्प नहीं था, बल्कि सत्ता हासिल करने का एक चतुर राजनीतिक पैंतरा था।

