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डिग्रीधारी युवाओं पर भारी ‘महंगाई का चाबुक’, 12 साल में फ्रेशर्स की वास्तविक कमाई घटी

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  • 2014 में ₹3.25 लाख का आईटी पैकेज 2026 में आज भी ₹3.60 लाख पर अटका

✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई | भारतीय कॉर्पोरेट जगत में पिछले एक दशक के दौरान रिकॉर्ड तकनीकी प्रगति और अर्थव्यवस्था के विस्तार के बावजूद देश के लाखों डिग्रीधारी युवाओं की शुरुआती आय में गंभीर ठहराव आया है। साल 2014 से 2026 के बीच के राष्ट्रीय आय व रोजगार आंकड़ों के विश्लेषण से यह चिंताजनक तस्वीर सामने आई है कि बीते 12 वर्षों में उपभोक्ता महंगाई लगभग 70 से 75 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है, जबकि देश के मुख्य रोजगार-प्रदाता आईटी और टेलीकॉम जैसे कोर सेक्टर्स में फ्रेशर्स के शुरुआती वेतन पैकेज में केवल 15 से 30 प्रतिशत की मामूली वृद्धि हुई है। नतीजतन, देश के टियर-2 और टियर-3 शहरों से निकलने वाले बहुसंख्यक बी.टेक और ग्रेजुएट युवाओं की वास्तविक क्रय शक्ति में 2014 की तुलना में भारी गिरावट दर्ज की गई है।

देश के संगठित क्षेत्र में सबसे ज्यादा नौकरियां देने वाले आईटी और आईटीईएस (IT/ITeS) सेक्टर के आंकड़े इस वेतन ठहराव की पूरी कहानी बयान करते हैं। वर्ष 2014 में देश की दिग्गज आईटी सेवा कंपनियां (मास-रिक्रूटर्स) औसतन ₹3.15 लाख से ₹3.50 लाख सालाना का शुरुआती पैकेज (वार्षिक सीटीसी) ऑफर कर रही थीं। वर्ष 2026 में भी अधिकांश सामान्य इंजीनियरिंग कॉलेजों के पास-आउट छात्रों के लिए यह पैकेज महज़ ₹3.60 लाख से ₹4.50 लाख के बीच ही अटका हुआ है।
टेलीकॉम सेक्टर में भी फ्रेशर पैकेज 2014 के ₹3.00 लाख के औसत स्तर से बढ़कर आज केवल ₹3.80 लाख के आसपास पहुँच पाया है। दूसरी ओर, भारतीय रिज़र्व बैंक और सांख्यिकी मंत्रालय के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आंकड़े बताते हैं कि 2014 में जिस जीवन-स्तर को बनाए रखने के लिए ₹3.25 लाख सालाना की आवश्यकता थी, आज महंगाई के कारण उसी जीवन-स्तर के लिए कम से कम ₹5.60 लाख से ₹5.80 लाख के पैकेज की दरकार है।

उद्योग जगत के अर्थशास्त्रियों और मानव संसाधन विशेषज्ञों का मानना है कि इस असंतुलन का सबसे बड़ा कारण मांग और आपूर्ति के बीच बना विशाल अंतर है। देश में हर साल 12 से 15 लाख से अधिक तकनीकी और पेशेवर डिग्रीधारी श्रम बाजार में कदम रखते हैं, जिससे एंट्री-लेवल पर जॉब सप्लाई बेहद ज्यादा है और कंपनियों के पास कम वेतन पर भी योग्य उम्मीदवार चुनने का विकल्प मौजूद रहता है।

इसके साथ ही पारंपरिक कॉलेज पाठ्यक्रम और उद्योग की आधुनिक आवश्यकताओं के बीच ‘स्किल गैप’ भी बड़ा कारण बना हुआ है। अधिकांश कॉलेजों में पुरानी तकनीक पर आधारित शिक्षा दी जा रही है, जिससे कंपनियां बेसिक रोल के लिए शुरुआती पैकेज बढ़ाने को तैयार नहीं होतीं।

हालांकि, इस निराशाजनक परिदृश्य के बीच कुछ उभरते हुए तकनीकी क्षेत्र अपवाद भी सिद्ध हुए हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा इंजीनियरिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग और साइबर सिक्योरिटी जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में ट्रेंड युवाओं की भारी मांग और प्रशिक्षित प्रतिभाओं की कमी के चलते इनके पैकेज में 2014 की तुलना में 50 से 70 प्रतिशत तक की बेहतर वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2014 में साइबर और एआई डोमेन में जहां एंट्री-लेवल पैकेज ₹3.50 लाख से ₹4.00 लाख के बीच था, वहीं आज विशेष योग्यता वाले फ्रेशर्स को ₹5.50 लाख से ₹6.50 लाख तक का शुरुआती पैकेज मिल रहा है। लेकिन यह राहत केवल 10 से 15 प्रतिशत उच्च-कुशल युवाओं तक सीमित है, जबकि बहुसंख्यक स्नातक युवा आज भी 12 साल पुरानी सैलरी स्ट्रक्चर पर काम करने को मजबूर हैं।


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