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विकास दर के सरकारी दावों पर रघुराम राजन का तीखा प्रहार; बोले- कुछ तो गड़बड़ है

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देश की 7 प्रतिशत से अधिक की ‘कथित’ विकास दर के आंकड़ों को कटघरे में खड़ा किया

✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई | पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने देश की 7 प्रतिशत से अधिक की ‘कथित’ विकास दर (जीडीपी) के आंकड़ों को कटघरे में खड़ा करते हुए सीधे जमीनी हकीकत पर सवाल दाग दिए हैं। राजन ने सरकारी दावों और व्यापारिक हकीकत के बीच गहरे फासले को उजागर करते हुए कहा कि देश में कॉरपोरेट निवेश का न होना और विदेशी पूंजी प्रवाह में लगातार आ रही गिरावट, आधिकारिक गुलाबी आंकड़ों से मेल नहीं खाती।

राजन ने दो टूक कहा, “अगर अर्थव्यवस्था वाकई इस रफ्तार से दौड़ रही है, तो निजी निवेश आखिर कहां है? कुछ तो गड़बड़ है (समथिंग इज ऑफ)।” उन्होंने कॉरपोरेट निवेश में जारी सुस्ती को खतरे की घंटी बताते हुए कहा कि उद्योगपतियों द्वारा नई क्षमताएं न बढ़ाना साफ संकेत है कि उन्हें बाजार में उस तरह की मांग ही नहीं दिख रही, जिसका दावा कागजी आंकड़ों में हो रहा है।

यह बड़ा विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब सरकार ने वर्ष 2022-23 को नया आधार वर्ष मानकर, पोस्ट-पेंडमिक कंजम्पशन और डिजिटल इकोनॉमी के आधार पर संशोधित जीडीपी डेटा पेश किया है। इस नई सीरीज के तहत दावा है कि वित्त वर्ष 2025-26 में अर्थव्यवस्था 7.7% और चौथी तिमाही में 7.8% की रफ्तार से बढ़ी है। लेकिन राजन के मुताबिक, ‘विकसित भारत 2047’ के नारों के अलावा सरकार के पास कोई स्पष्ट आर्थिक रोडमैप या ग्रोथ स्ट्रेटेजी नहीं है।

मिडिल ईस्ट संकट और अमेरिकी डॉलर ने बढ़ाईं मुश्किलें

स्टोरी का दूसरा गंभीर पहलू पश्चिम एशिया का युद्ध है, जिसने भारत की कमजोरियों को बेनकाब कर दिया है। लगातार बढ़ते तेल और फर्टिलाइजर खर्च के बीच, रेटिंग एजेंसी फिच (Fitch) ने अमेरिकी-ईरान युद्ध के चलते वास्तविक आमदनी और क्रय शक्ति घटने की आशंका जताते हुए भारत की विकास दर का अनुमान संशोधित कर 6.4% कर दिया है, वहीं आरबीआई भी इसे घटाकर 6.6% पर ले आया है।

राजन ने चेताया कि कच्चे तेल की मार से आम जनता को बचाने के लिए सरकार कब तक सब्सिडी का बोझ उठाएगी? यह राजकोषीय स्थिति को बिगाड़कर देश को कर्ज के जाल में धकेलेगा और स्वास्थ्य-शिक्षा जैसे बुनियादी बजट को लील जाएगा। हालांकि, केंद्रीय बैंक ने विदेशी इनफ्लो को आकर्षित कर रुपये को संभालने के प्रयास शुरू किए हैं, जिससे $50 बिलियन आने की उम्मीद है, लेकिन अनिश्चितता के काले बादल अभी भी मंडरा रहे हैं।

 


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