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फॉर्म फीस का ‘बिजनेस’: बेरोजगारों की जेब से सरकारी खजाना मालामाल

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  • सरकारी नौकरी का मायाजाल

  • 12 साल, 30 करोड़ आवेदन और चयन मात्र 0.3%; युवाओं की उम्मीदों से भरा खजाना

    • 2014 से 2026 का रिपोर्ट कार्ड

    • आवेदनों का पहाड़ और नियुक्तियों का सूखा

✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई | भारत में ‘सरकारी नौकरी’ केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय जुनून बन चुकी है, लेकिन इसके पीछे के आंकड़े एक डरावनी सच्चाई बयां कर रहे हैं। वर्ष 2014 से लेकर 2026 तक के 12 वर्षों के संचयी डेटा का विश्लेषण करें तो केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों के लिए आवेदनों का आंकड़ा 30.50 करोड़ के पार निकल गया है। विडंबना यह है कि आवेदनों के इस महासागर के बीच नियुक्ति का द्वीप बेहद छोटा ह। इस पूरी अवधि में सरकार बमुश्किल 10.8 लाख युवाओं को ही स्थाई सेवा में शामिल कर पाई है। यानी चयन की दर महज 0.35% रही है, जो देश के ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

बेरोजगारी की फीस से भरा सरकारी खजाना

सरकारी तंत्र की इस विशाल भर्ती प्रक्रिया का एक और चौंकाने वाला पक्ष इसका ‘रेवेन्यू मॉडल’ है। 2022 तक आवेदन शुल्क के रूप में सरकार के पास लगभग 20,000 करोड़ रुपये जमा हुए थे। 2022 से 2026 के बीच बढ़ी हुई फीस और आवेदकों की बढ़ती तादाद के बाद अब यह आंकड़ा 32,000 करोड़ रुपये को लांघ चुका है। एक ओर जहां अभ्यर्थी अपनी बचत से फॉर्म की फीस भर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भर्ती एजेंसियों के लिए यह प्रक्रिया राजस्व का एक बड़ा जरिया बन गई है, जबकि अंतिम परिणाम के लिए युवाओं को सालों तक अदालती चक्कर और पेपर लीक जैसी चुनौतियों से जूझना पड़ता है।

भर्ती की घटती रफ्तार और बढ़ता ‘पेंडेंसी’ गैप

लोकसभा में पेश किए गए कार्मिक मंत्रालय के ऐतिहासिक आंकड़ों और हालिया रुझानों को जोड़ें तो भर्ती की रफ्तार में गिरावट साफ नजर आती है। 2014-15 में जहां 1.30 लाख युवाओं को सरकारी अनुशंसा मिली थी, वहीं 2024-25 के दौरान ‘मिशन मोड’ के दावों के बावजूद वास्तविक नियुक्तियों का औसत 90,000 के आसपास सिमट गया है।

डिजिटल सुधारों के नाम पर पदों के ‘आउटसोर्सिंग’ और ‘एकीकरण’ ने स्थाई पदों की संख्या को सीमित कर दिया है। आज स्थिति यह है कि एक अदद चपरासी या क्लर्क के पद के लिए हजारों की संख्या में इंजीनियर और पीएचडी डिग्री धारक आवेदन कर रहे हैं।

30 करोड़ से अधिक आवेदनों का बोझ

2026 की शुरुआत तक की स्थिति यह है कि रेलवे (RRB), एसएससी (SSC) और बैंकिंग (IBPS) जैसी बड़ी परीक्षाओं में आवेदनों का अंबार तो लगा है, लेकिन जॉइनिंग लेटर मिलने की प्रतीक्षा अवधि औसत 18 से 24 महीने तक खिंच गई है।

लगभग 30 करोड़ से अधिक आवेदनों का यह बोझ न केवल सिस्टम की सुस्ती को दर्शाता है, बल्कि उस ‘एज-आउट’ होते युवाओं के दर्द को भी बयां करता है, जो अपनी उम्र का सबसे कीमती हिस्सा परीक्षा हॉल और लाइब्रेरी के बीच खपा रहे हैं। बिना किसी ठोस स्ट्रक्चरल सुधार के, सरकारी नौकरी का यह सपना अब एक ‘लॉटरी’ में तब्दील होता जा रहा है।

 


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