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वेतन व्यवस्था का सच: सरकारी कर्मचारी vs साहब, न्यूनतम वेतन भी निजी मजदूर से पीछे

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  • भत्तों और सुविधाओं से और बढ़ती असमानता

  • निजी सेक्टर में सरकारी नौकरी भी पीछे! वेतन असमानता पर बड़ा खुलासा

✍️ वरिष्ठ संवाददाता, मुंबई/नई दिल्ली | देश की वेतन संरचना पर श्रम मंत्रालय और सातवें वेतन आयोग से जुड़े ताजा आंकड़े प्रशासनिक ढांचे के भीतर जड़ जमा चुकी असमानता को साफ-साफ सामने रखते हैं। सरकारी तंत्र में शीर्ष स्तर और निचले स्तर के बीच वेतन का अंतर अब संरचनात्मक रूप ले चुका है। वर्तमान में जहां उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों का वेतन 2,25,000 रुपये तक पहुंच चुका है, वहीं उसी व्यवस्था का सबसे निचला कर्मचारी 18,000 रुपये के न्यूनतम वेतन पर बना हुआ है। यह अंतर केवल आय का नहीं, बल्कि पदानुक्रम आधारित वेतन निर्धारण की उस व्यवस्था का परिणाम है, जिसमें निचले स्तर की आय वृद्धि सीमित दायरे में ही रखी गई है।

आजाद भारत के पहले वेतन आयोग से लेकर सातवें वेतन आयोग तक का सफरनामा असल में देश के भीतर दो अलग-अलग दुनिया बनाने की कहानी है। लेबर ब्यूरो इंडिया और मिनिस्ट्री ऑफ लेबर एंड एम्प्लॉयमेंट तथा वेतन आयोगों के आंकड़े बताते हैं कि शुरुआती दौर में न्यूनतम और अधिकतम वेतन के बीच का अंतर अपेक्षाकृत सीमित था, लेकिन समय के साथ यह अंतर तेजी से बढ़ा है। वर्तमान स्थिति में दोनों के बीच का फासला दो लाख रुपये से अधिक का हो चुका है। इससे सरकारी ढांचे के भीतर आय असंतुलन स्थायी रूप लेता दिख रहा है।

आंकड़ों के अनुसार, 1952 में गठित पहले वेतन आयोग से लेकर 2016 के सातवें वेतन आयोग तक सरकारी कर्मचारियों के वेतन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।

न्यूनतम वेतन की छलांग: पहले वेतन आयोग में न्यूनतम वेतन मात्र ₹55 था, जो सातवें वेतन आयोग में बढ़कर ₹18,000 हो गया। यह लगभग 32,627% की ऐतिहासिक वृद्धि है।

अधिकतम वेतन का विस्तार: इसी अवधि में अधिकतम वेतन ₹2,000 से बढ़कर ₹2,25,000 (कैबिनेट सचिव स्तर) पहुंच गया, जो 11,150% की वृद्धि दर्शाता है।

निजी क्षेत्र में लागू ‘फ्लोर वेज’ के आंकड़े भी इस असमानता की अलग तस्वीर पेश करते हैं। नेशनल स्टेटिस्टिकल ऑफिस (NSO) के पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के नवीनतम उपलब्ध आंकड़े के अनुसार, अकुशल श्रमिक का औसत वेतन 20,358 रुपये और उच्च कौशल वाले श्रमिक का 26,910 रुपये दर्ज किया गया है। दोनों के बीच सीमित अंतर यह संकेत देता है कि न्यूनतम वेतन ढांचे के भीतर श्रमिकों की आय एक तय सीमा में बंधी हुई है। इसी क्षेत्र में शीर्ष प्रबंधन स्तर पर वेतन संरचना पूरी तरह अलग है, जहां पैकेज करोड़ों में हैं और उनके लिए कोई समानांतर मानक लागू नहीं है।

हालांकि सरकारी और निजी क्षेत्र के आंकड़ों की तुलना में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। सातवें वेतन आयोग के तहत तय 18,000 रुपये का न्यूनतम वेतन, निजी क्षेत्र के अकुशल श्रमिक के औसत वेतन 20,358 रुपये से कम है। इससे सरकारी सेवा के निचले स्तर की आय प्रतिस्पर्धा में पीछे जाती दिख रही है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) और मंत्रालय से जुड़े आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि उच्च पदों पर मिलने वाले भत्तों और सुविधाओं का स्तर निचले कर्मचारियों की कुल मासिक आय की तुलना में काफी अधिक है। इससे वेतन संरचना के भीतर वास्तविक आय अंतर और बढ़ जाता है।

उपलब्ध आंकड़े संकेत देते हैं कि देश में वेतन निर्धारण का ढांचा अब समानता के बजाय पद आधारित विभाजन की ओर झुका हुआ है, जिसमें उच्च और निम्न स्तर के बीच आय का अंतर लगातार बढ़ रहा है।


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