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EPF मेंबर्स ध्यान दें: नौकरी के साथ मुफ्त मिलने वाले इस बड़े सरकारी फायदे को भूल तो नहीं गए आप?

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  • EDLI स्कीम के तहत पहले दिन से ही एक्टिव हो जाता है लाइफ इंश्योरेंस कवर

  • बिना किसी मेडिकल टेस्ट या कागजी चक्रव्यूह के मिलता है पूरा क्लेम

✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, नई दिल्ली/मुंबई | देश के करोड़ों नौकरीपेशा लोग हर महीने अपनी सैलरी स्लिप में ईपीएफ (EPF) का कटने वाला हिस्सा तो बड़े ध्यान से देखते हैं, लेकिन वे उस अदृश्य वित्तीय सुरक्षा कवच से पूरी तरह बेखबर रह जाते हैं जो सरकार उन्हें बिल्कुल मुफ्त में देती है। भविष्य निधि संगठन (EPFO) अपने हर सक्रिय सदस्य को 7 लाख रुपये तक का लाइफ इंश्योरेंस कवर प्रदान करता है, जिसके लिए कर्मचारी को अपनी जेब से एक धेला भी प्रीमियम के रूप में नहीं चुकाना पड़ता। यह एक ऐसी खामोश सरकारी योजना है जो संकट के समय किसी भी कामकाजी परिवार के लिए सबसे बड़ा संबल बन सकती है, बशर्ते लोग इसके नियमों और अधिकारों को सही ढंग से समझें।

आमतौर पर मध्यमवर्ग के बीच यह धारणा आम है कि बीमा का मतलब हर महीने या हर साल जेब से जाने वाली एक मोटी किश्त है। इसी वजह से देश में एक बड़ा तबका लाइफ इंश्योरेंस से कतराता है। लेकिन कर्मचारियों के इस डर को दूर करने के लिए सरकार ने साल 1976 में ही एक बेहद दूरगामी कानून बनाया था, जिसे ‘कर्मचारी निक्षेप सहबद्ध बीमा योजना’ यानी ईडीएलआई (EDLI) कहा जाता है।

नियम बेहद सीधा और स्पष्ट है कि जैसे ही कोई व्यक्ति किसी ऐसी कंपनी या संस्थान में भर्ती होता है जहां पीएफ कटता है, वह पहले ही दिन से इस 7 लाख रुपये के जीवन बीमा का हकदार बन जाता है। इसके लिए उसे किसी तरह के मेडिकल टेस्ट से नहीं गुजरना पड़ता और न ही किसी अतिरिक्त कागजी कार्रवाई के चक्रव्यूह में फंसना होता है।

इस पूरे वित्तीय तंत्र की सबसे खूबसूरत बात इसका प्रीमियम मॉडल है, जो पूरी तरह से नियोक्ता यानी कंपनी की जिम्मेदारी होता है। कंपनी आपके बुनियादी वेतन का 0.50% (अधिकतम 75 रुपये) सीधे इस इंश्योरेंस फंड में जमा करती है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि जब तक कर्मचारी की नौकरी सुरक्षित है और उसका पीएफ खाता सक्रिय है, तब तक उसका यह लाइफ इंश्योरेंस कवर बिना किसी बाधा के बैकग्राउंड में चलता रहता है।

अब सवाल उठता है कि इस 7 लाख रुपये की रकम का गणित क्या है। दरअसल, इस बीमे की राशि का निर्धारण कर्मचारी के पिछले 12 महीनों के औसत वेतन के आधार पर किया जाता है। कानूनन इसके दो हिस्से होते हैं, जिसमें पहला हिस्सा कर्मचारी के औसत मासिक वेतन का 35 गुना होता है और दूसरा हिस्सा पीएफ खाते में जमा औसत बैलेंस का 50% होता है। सरकार ने इसके लिए अधिकतम वेतन सीमा 15,000 रुपये तय की है, जिसके चलते मूल गणना 5,25,000 रुपये बैठती है और इसमें अधिकतम 1,75,000 रुपये का बोनस जुड़ जाता है। इन दोनों को मिलाकर कुल राशि ठीक 7 लाख रुपये बनती है। यदि दुर्भाग्यवश सेवाकाल के दौरान किसी कर्मचारी की मृत्यु हो जाती है, तो उसके नॉमिनी को यह पूरी रकम सौंप दी जाती है।

सरकार ने इसमें समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े कामगारों के लिए भी एक न्यूनतम सुरक्षा की गारंटी तय की है। सामान्य परिस्थितियों में इस योजना के तहत मिलने वाला न्यूनतम वित्तीय लाभ 2.5 लाख रुपये निर्धारित है। हालांकि, हालिया प्रशासनिक सुधारों के तहत इसमें एक बेहद मानवीय बदलाव भी शामिल किया गया है, जिसके अनुसार यदि किसी बेहद कम वेतन वाले या नए जुड़े कर्मचारी का औसत पीएफ बैलेंस 50,000 रुपये से भी कम बैठता है, तो भी उसके परिवार को कम से कम 50,000 रुपये की त्वरित आर्थिक सहायता मिलना सुनिश्चित किया गया है। संकट की उस घड़ी में यह किसी भी गरीब परिवार को टूटने से बचाने के लिए एक मजबूत ढाल साबित होती है।


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