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कांस्टेबल बनने की कतार में 28 लाख युवा

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  • बेरोजगारी के चक्रव्यूह में फंसे देश के नौनिहाल, 32 हजार पदों के लिए बेरोजगारों का रेला

  • यूपी भर्ती परीक्षा ने खोल दी रोजगार की हकीकत

  • बीटेक, परास्नातक और प्रशिक्षित शिक्षक भी परीक्षार्थी

✍️ प्रहरी संवाददाता लखनऊ | उत्तर प्रदेश पुलिस आरक्षी भर्ती परीक्षा के केंद्रों पर इन दिनों सिर्फ पुलिस की वर्दी का सपना देखने वाले युवा नहीं दिख रहे, बल्कि देश की रोजगार व्यवस्था का एक कड़वा आईना भी नजर आ रहा है। जिस परीक्षा के जरिए 32,679 पद भरे जाने हैं, उसके लिए करीब 28.86 लाख आवेदन आए हैं। इनमें बड़ी संख्या उन युवाओं की है जिनके हाथों में कभी इंजीनियरिंग, परास्नातक और पेशेवर डिग्रियों के सपने थे, लेकिन आज वे आरक्षी की नौकरी के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।

दिलचस्प यह है कि देश में ‘स्किल इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘युवा शक्ति’ जैसे नारों की गूंज के बीच लाखों पढ़े-लिखे युवा एक आरक्षी पद के लिए लाइन में खड़े हैं। यह सिर्फ भर्ती परीक्षा नहीं, बल्कि रोजगार बाजार की वास्तविकता की परीक्षा भी है।

उत्तर प्रदेश पुलिस के आरक्षी एवं समकक्ष पदों के लिए आयोजित भर्ती परीक्षा अब सिर्फ वर्दी का सपना देखने वालों की नहीं, बल्कि हजारों उच्च शिक्षा प्राप्त और बेरोजगार युवाओं की भी परीक्षा बन गई है। लखनऊ के चारबाग समेत कई रेलवे स्टेशनों पर रातभर अभ्यर्थी प्लेटफॉर्म पर पढ़ते या आराम करते दिखे।

8 जून से शुरू हुई भर्ती परीक्षा में गोरखपुर की वंदना चौहान भी शामिल हुईं। बीटीसी और स्नातक की डिग्री रखने वाली वंदना बताती हैं कि शिक्षक भर्ती का इंतजार करते-करते आठ साल गुजर गए। मजबूरी में अब पुलिस भर्ती परीक्षा दे रही हैं।

बलिया के विज्ञान स्नातकोत्तर चंद्रशेखर गुप्ता का दर्द भी कुछ अलग नहीं। उनका कहना है कि बेरोजगारी ने विकल्प ही खत्म कर दिए हैं। नौकरी चाहिए, इसलिए आरक्षी पद के लिए आवेदन किया है।

बस्ती की बीटेक डिग्री धारक चंद्रकला श्रीवास्तव कहती हैं कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद भी रोजगार की गारंटी नहीं है। ऐसे में जो नौकरी मिले, वही बेहतर है। देवरिया के परास्नातक आशीष सिंह का मानना है कि भर्ती प्रक्रियाएं अक्सर योग्यता नहीं, उपलब्ध अवसरों के हिसाब से चलती हैं। इसलिए अब युवा अपनी डिग्री नहीं, नौकरी की संभावना देख रहे हैं।

उधर, परीक्षा केंद्रों तक पहुंचना भी किसी प्रतियोगिता से कम नहीं रहा। रेलवे स्टेशनों पर रातभर प्लेटफॉर्म पर पढ़ते और सोते अभ्यर्थी दिखे। ट्रेनें लेट हुईं तो कई युवाओं को परीक्षा केंद्र तक पहुंचने के लिए दौड़ लगानी पड़ी।

रायबरेली के शिवम कुमार बताते हैं कि उनके पिता दिहाड़ी मजदूर हैं और पूरे परिवार की उम्मीदें उन्हीं पर टिकी हैं। उनकी सबसे बड़ी चिंता नौकरी से पहले परीक्षा की निष्पक्षता को लेकर है।

वाणिज्य और विज्ञान में स्नातक अभ्यर्थियों ने माना कि सही करियर के मौके नहीं मिल रहे और महंगाई-बेरोजगारी में आरक्षी पद के लिए आवेदन करना मजबूरी है। उन्होंने कहा कि अब स्थिर सरकारी नौकरी प्राथमिकता है, भले ही योग्यता से कम पद क्यों न हो।

सरकार ने रोडवेज बसों में किराये में 50 प्रतिशत छूट देकर राहत जरूर दी है, लेकिन असली सवाल अभी भी वहीं खड़ा है-जब बीटेक, परास्नातक और प्रशिक्षित शिक्षक आरक्षी बनने को मजबूर हों, तब समस्या भर्ती परीक्षा में नहीं, रोजगार व्यवस्था की बुनियाद में तलाशनी चाहिए। क्योंकि डिग्रियों का बढ़ता अंबार और अवसरों का सिकुड़ता दायरा मिलकर उस पीढ़ी को जन्म दे रहा है, जो सपनों से ज्यादा सरकारी नौकरी की स्थिरता को महत्व देने लगी है।


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