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मोदी सरकार की नीतियां फेल: चीन के सामने हांफ रहा भारतीय उद्योग, अपने ‘खास’ कॉरपोरेट्स को रियायतें और आम विनिर्माता वैश्विक बाजार में बेसहारा

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  • चीन के मुकाबले भारतीय विनिर्माताओं को बेहद कम सरकारी मदद

  • ओईसीडी की रिपोर्ट ने खोली नीतिगत प्राथमिकताओं की पोल

✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई / नई दिल्ली | वैश्विक विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) बाजार में आत्मनिर्भर भारत और ‘मेक इन इंडिया’ के बड़े-बड़े दावों के बीच एक बेहद कड़वी और लाचार तस्वीर सामने आई है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) की ताजा रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि केंद्र की भाजपा सरकार की ढुलमुल नीतियों ने भारतीय कंपनियों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में चीनी ड्रैगन के सामने बिल्कुल बेसहारा छोड़ दिया है।

तस्वीर का सबसे विरोधाभासी और विडंबनापूर्ण पहलू यह है कि एक तरफ जहां सरकार देश के कुछ चुनिंदा हैवीवेट कॉरपोरेट मित्रों पर मेहरबान रहती है और उनकी सहूलियत के हिसाब से सरकारी खैरात और रियायतें तय होती हैं, वहीं देश के मुख्य विनिर्माण क्षेत्र जैसे स्टील, सीमेंट, भारी मशीनरी और निर्माण सेक्टर को सरकार की तरफ से कोई ठोस रणनीतिक वित्तीय मदद नहीं मिल रही है।

ओईसीडी की ‘मैजिस डेटाबेस ऑफ इंडस्ट्रियल सब्सिडीज’ (MAGIS) रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2005 से 2024 के बीच भारतीय विनिर्माताओं को अपने चीनी प्रतिस्पर्धियों की तुलना में बेहद मामूली सरकारी सहायता और सब्सिडी मिली है। इस रिपोर्ट ने साफ किया है कि वैश्विक बाजार में चीन की आक्रामक पकड़ के पीछे वहां की सरकार से मिलने वाली चौतरफा वित्तीय मदद है, जबकि भारत की नीतियां हमारे आम विनिर्माता को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के चक्रव्यूह में सुरक्षा कवच देने में पूरी तरह नाकाम रही हैं।

दुनिया के 15 प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों के 525 सबसे बड़े विनिर्माताओं के वास्तविक वित्तीय विवरणों पर आधारित इस रिपोर्ट ने मोदी सरकार के आर्थिक दावों की हवा निकाल दी है। कागजी घोषणाओं के बजाय प्रत्यक्ष अनुदान (ग्रांट्स), टैक्स छूट और बाजार दरों से कम पर मिलने वाले सस्ते सरकारी लोन के आधार पर किए गए इस आकलन में भारत सरकार की नीतिगत उदासीनता खुलकर सामने आई है।

रिपोर्ट के अनुसार, समीक्षाधीन अवधि में चीनी कंपनियों को ओईसीडी सदस्य देशों के मुकाबले औसतन 3 से 8 गुना अधिक सरकारी सहायता मिली। यह सब्सिडी भारत, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की कंपनियों को मिलने वाली मदद से भी कहीं ज्यादा थी। डेटा के मुताबिक, साल 2005 से 2023 के बीच वैश्विक बाजार हिस्सेदारी में बढ़त हासिल करने वाली कंपनियों की कुल वृद्धि का 22 प्रतिशत हिस्सा सरकारी सब्सिडी के दम पर था, जबकि चीनी कंपनियों के मामले में यह आंकड़ा बेहद चौंकाने वाला 60 प्रतिशत रहा।

हालांकि सरकार की इस भारी अनदेखी और सौतेले व्यवहार के बावजूद, भारतीय उद्योग जगत ने अपने बलबूते अपनी मजबूत और साफ-सुथरी कार्यप्रणाली का लोहा मनवाया है। स्टील, सीमेंट, उर्वरक, भारी मशीनरी, ग्लास और सिरेमिक जैसे प्रमुख बुनियादी क्षेत्रों में भारत एक पारदर्शी और ‘स्वच्छ खिलाड़ी’ (Clean Player) बनकर उभरा है। जहां चीनी कंपनियां अपनी सरकार की मेहरबानी से बेंचमार्क से काफी नीचे की ब्याज दरों और बाजार को विकृत करने वाली भारी सरकारी खैरात के दम पर फल-फूल रही हैं, वहीं भारतीय कंपनियां सरकार से बिना कोई विशेष रणनीतिक वित्तीय सहयोग पाए, बाजार की सामान्य और महंगी शर्तों पर ही ऋण लेकर वैश्विक स्तर पर मुकाबला कर रही हैं।

इसके अतिरिक्त, रिपोर्ट ने वैश्विक व्यापार नियमों में पारदर्शिता की कमी और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के स्तर पर बढ़ती अपारदर्शिता को भी उजागर किया है, जहां अपनी सब्सिडी की जानकारी छिपाने वाले सदस्य देशों की संख्या साल 1995 के 26 (23 प्रतिशत) से बढ़कर साल 2025 में 117 (70 प्रतिशत) तक पहुंच चुकी है।

वैश्विक स्तर पर जानकारी छिपाने की इसी बढ़ती प्रवृत्ति और घरेलू स्तर पर चंद कॉरपोरेट प्राथमिकताओं में व्यस्त व्यवस्था के बीच, भारत का आम विनिर्माता बिना किसी मजबूत सरकारी वित्तीय बैकअप के अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चीन की भारी सब्सिडी वाली कंपनियों के सामने लगातार पिछड़ने को मजबूर है।


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