✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई | वैश्विक अनिश्चितताओं, अंतरराष्ट्रीय तनाव और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इस समय नीतिगत मोर्चे पर अब तक के सबसे कड़े दबाव का सामना कर रहा है। हालांकि, जून की मौद्रिक नीति समीक्षा में केंद्रीय बैंक ने बाजार की उम्मीदों के विपरीत रेपो रेट को 5.25% पर बरकरार रखकर एक साहसिक कदम उठाया है, लेकिन आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि चालू खाता घाटे (CAD) और मुद्रास्फीति (महंगाई) के मोर्चे पर चुनौतियां अभी कम नहीं हुई हैं। ब्याज़ दरें बढ़ाने के बजाय पूरी तरह से ‘कैपिटल-फ्लो’ (पूंजी-प्रवाह) उपायों पर भरोसा करना यह दर्शाता है कि आरबीआई इस समय चौतरफा दबाव के बीच संतुलन बनाने की बेहद जटिल कवायद में जुटा है।
क्रूड ऑयल की मार और भुगतान संतुलन (BoP) का संकट
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के आयात बिल को लगातार भारी बना रही हैं, जिससे देश का चालू खाता घाटा तेजी से चौड़ा हुआ है। बार्कलेज (Barclays) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत को इस समय अपने बाहरी वित्तपोषण अंतर (External Financing Gap) को पाटने के लिए हर महीने लगभग 7 से 8 अरब डॉलर के विदेशी निवेश की सख्त दरकार है।
विदेशी निवेशकों को टैक्स छूट, नियमों में ढील
आरबीआई ने विदेशी निवेशकों को लुभाने के लिए सरकारी प्रतिभूतियों पर टैक्स छूट और निवेश नियमों में ढील जैसे जो कदम उठाए हैं, उनसे हर महीने अधिकतम 5 अरब डॉलर तक की ही अतिरिक्त आवक होने की उम्मीद है। इसका सीधा मतलब है कि डॉलर की मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है, जो रुपये की साख और आरबीआई की विदेशी मुद्रा भंडार प्रबंधन नीति पर भारी दबाव बनाए हुए है।
अंतरराष्ट्रीय तनाव और महंगाई (मुद्रास्फीति) का डबल अटैक
रूस-यूक्रेन से लेकर मध्य-पूर्व (मिडल ईस्ट) तक फैले जियोपॉलिटिकल तनाव ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण कमोडिटी और खाद्य पदार्थों की कीमतों में होने वाले ‘सप्लाई-साइड शॉक’ सीधे तौर पर घरेलू मोर्चे पर महंगाई को हवा दे रहे हैं।
आरबीआई के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह है कि यदि वह महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ब्याज़ दरें बढ़ाता है, तो इससे देश की आर्थिक विकास दर (Growth Rate) प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि केंद्रीय बैंक ने साल 2026 तक नीतिगत दरों में यथास्थिति बनाए रखने का संकेत दिया है, यानी वह विकास को गति देने के लिए सप्लाई-साइड से पैदा होने वाली अस्थायी महंगाई को सहन करने पर मजबूर है, बशर्ते वह पूरी अर्थव्यवस्था को अपनी चपेट में न ले ले।
वैल्युएशन की चिंता और रुपये को संभालने की चुनौती
एक तरफ जहां भारतीय बाजार के ऊंचे वैल्युएशन और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के चलते विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) लगातार आक्रामक बिकवाली कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आरबीआई पर रुपये के अवमूल्यन (Depreciation) को रोकने की दोहरी जिम्मेदारी है।
केंद्रीय बैंक ने साफ किया है कि वह विदेशी निवेशकों के बाहर निकलने पर कोई प्रशासनिक प्रतिबंध नहीं लगाएगा, बल्कि आकर्षक नीतियों के दम पर डॉलर की आवक बढ़ाएगा। वाणिज्यिक वाणिज्यिक उधार (ECB) के नियमों में ढील और बैंकों को FCNR(B) डिपॉजिट के लिए दिए गए इंसेंटिव से अगले कुछ महीनों में 10 से 15 अरब डॉलर आने की उम्मीद तो है, लेकिन अगर कच्चे तेल के दाम और अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर तनाव इसी तरह बरकरार रहा, तो आने वाले समय में आरबीआई को तरलता और ब्याज़ दरों के मोर्चे पर बेहद कड़े और अप्रिय फैसले लेने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
