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उच्च शिक्षा में ‘सुपर रेगुलेटर’ से स्वायत्तता पर संकट: संसद की संयुक्त समिति ने नए शिक्षा बिल पर जताई कड़ी आपत्ति

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  • नए शिक्षा बिल 2025 पर संसद की समिति ने उठाए सवाल, UGC-AICTE खत्म होने पर चिंता

✍️ प्रहरी संवाददाता,  मुंबई / नई दिल्ली | देश के उच्च शिक्षा ढांचे में आमूलचूल बदलाव के लिए लाए गए ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल, 2025’ पर संसद की संयुक्त समिति ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पिछले साल दिसंबर में लोकसभा में पेश होने के बाद समिति को भेजे गए इस बिल की ड्राफ्ट रिपोर्ट में शक्तियों के अत्यधिक केंद्रीकरण को लेकर आगाह किया गया है। समिति का मानना है कि यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC), AICTE और NCTE जैसी स्थापित संस्थाओं को खत्म कर सारा अधिकार एक ही केंद्रीय रेगुलेटर को सौंपने से नौकरशाही या वैचारिक दखल बढ़ सकता है, जिससे उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता सीधे तौर पर प्रभावित होगी।

जुर्माने की मनमानी पर रोक और व्यक्तिगत जवाबदेही

समिति ने बिल में प्रस्तावित भारी-भरकम जुर्माने की व्यवस्था पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि रेगुलेटरी काउंसिल अपनी शक्तियों का उपयोग मनमाने तरीके से नहीं कर सकती। जुर्माना केवल नियमों के उल्लंघन के पूरी तरह सिद्ध होने पर ही लगाया जाना चाहिए, न कि किसी पूर्वाग्रह के आधार पर।

इसके साथ ही, समिति ने बिल के उस प्रावधान का समर्थन किया है जो धोखाधड़ी करने वाले संस्थानों के प्रमोटरों की ‘कॉर्पोरेट आड़’ को हटाता है। अब बार-बार नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों के जिम्मेदार कर्मचारियों और ट्रस्टियों पर व्यक्तिगत जवाबदेही तय होगी और उन्हें पद से भी हटाया जा सकेगा।

नियुक्तियों में लेटलतीफ़ी पर सवाल: तय हुई समय-सीमा

केंद्रीय संस्थानों में लंबे समय से खाली पड़े पदों और प्रशासनिक शिथिलता पर समिति ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। पैनल ने सिफारिश की है कि रिटायरमेंट या सुपर एनुएशन के कारण होने वाली तय रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया पद खाली होने से कम से कम 6 महीने पहले शुरू हो जानी चाहिए। किसी भी परिस्थिति में पद खाली होने के 90 दिनों के भीतर नियुक्ति प्रक्रिया पूरी कर ली जानी चाहिए।

समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि काउंसिल के अध्यक्ष और पूर्णकालिक सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा गठित ‘सर्च-कम-सिलेक्शन कमेटी’ की सिफारिश पर हो, जबकि अन्य सदस्यों की नियुक्ति सीधे केंद्र सरकार करे ताकि प्रक्रिया में देरी न हो।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) का रोडमैप और आगे की राह

मूल रूप से यह बिल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की सिफारिशों को जमीन पर उतारने के लिए तैयार किया गया है, जिसके तहत उच्च शिक्षा की निगरानी को तीन विशेष वर्टिकल- रेगुलेशन, एक्रेडिटेशन और स्टैंडर्ड्स- में बांटने का प्रस्ताव है।

सरकार ने संयुक्त समिति की समीक्षा रिपोर्ट को मंजूरी मिलने के बाद अब बिल को संसद में विचार और पारित कराने के लिए सूचीबद्ध कर दिया है। हालांकि, संयुक्त समिति द्वारा स्वायत्तता और शक्तियों के केंद्रीकरण को लेकर उठाए गए तीखे सवालों के बाद, अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार संसद पटल पर इन संशोधनों को किस तरह शामिल करती है।

 


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