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विपक्ष में सेंध, एजेंसियों की छाया और ‘अजेय सत्ता’ की राजनीति — क्या बदल रहा है भारतीय लोकतंत्र?

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विशेष रिपोर्ट 

✍🏻प्रहरी संवाददाता, मुंबई/ नई दिल्ली | भारतीय राजनीति में अब चुनाव सिर्फ वोटों से नहीं, बल्कि विधायकों, संसाधनों और राजनीतिक दबाव की ताकत से भी तय होते दिखाई दे रहे हैं। पिछले एक दशक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सिर्फ चुनावी जीत दर्ज नहीं की, बल्कि विपक्षी दलों के भीतर ऐसी लगातार सेंध लगाई कि कई राज्यों में पूरी की पूरी राजनीतिक तस्वीर ही बदल गई।

महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी की टूट, मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार का गिरना, बिहार में तृणमूल कॉंग्रेंस में बगावत, गोवा और कर्नाटक में विधायकों के पाला बदलने जैसी घटनाओं ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या अब भारतीय राजनीति में विपक्ष सिर्फ चुनाव हार रहा है या धीरे-धीरे “खत्म” भी किया जा रहा है। विपक्ष इसे लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने की रणनीति बता रहा है, जबकि भाजपा इसे अपने नेतृत्व और “डबल इंजन” मॉडल पर बढ़ते भरोसे का प्रमाण कहती है।

दिलचस्प यह है कि जिन नेताओं पर कभी भ्रष्टाचार, घोटाले और सत्ता दुरुपयोग के आरोप लगते रहे, उनमें से कई भाजपा में शामिल होने के बाद अचानक राजनीतिक रूप से “स्वच्छ” नजर आने लगते हैं। विपक्ष आरोप लगाता है कि प्रवर्तन निदेशालय (ED), सीबीआई और आयकर विभाग अब सिर्फ जांच एजेंसियां नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव के औजार बनते जा रहे हैं। भाजपा इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को राजनीति से जोड़ना गलत है।

चुनावी फंडिंग को लेकर भी सवाल लगातार गहराए हैं। चुनावी बॉन्ड योजना के जरिए आए हजारों करोड़ रुपये के चंदे ने राजनीतिक असमानता की बहस को और तेज किया। विपक्ष का आरोप है कि सत्ता पक्ष के पास संसाधनों का ऐसा केंद्रीकरण हो चुका है, जहां बाकी दल चुनाव लड़ते कम और अस्तित्व बचाने की लड़ाई ज्यादा लड़ते दिखाई देते हैं। लोकतंत्र में अब “जनता का जनादेश” कम और “मैनेजमेंट का मॉडल” ज्यादा प्रभावी दिखने लगा है।

संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर भी राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ा है। संसद में विपक्षी सांसदों के निलंबन, राज्यपालों की सक्रियता, मीडिया के एक हिस्से पर सत्ता के पक्ष में झुकाव और जांच एजेंसियों की टाइमिंग को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। सरकार का कहना है कि सभी संस्थाएं संविधान के दायरे में काम कर रही हैं और विपक्ष अपनी राजनीतिक विफलताओं को संस्थाओं पर आरोप लगाकर छिपाना चाहता है।

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों की कमजोर संगठनात्मक स्थिति ने भाजपा के लिए रास्ता आसान जरूर किया, लेकिन मौजूदा दौर में सत्ता का केंद्रीकरण पहले से कहीं अधिक दिखाई दे रहा है। भारतीय राजनीति में अब यह बहस तेज हो चुकी है कि क्या देश बहुदलीय लोकतंत्र से धीरे-धीरे “एक प्रमुख दल वाली व्यवस्था” की ओर बढ़ रहा है।


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