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भाषा को लेकर हिंदुस्तानी नजरिया अपनाइए, हिंदुत्ववादी नहीं

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वीरेंद्र यादव

‘हिंदी, हिंदू , हिंदुस्थान’ का नारा हवा हवाई नहीं था, इसमें सन्निहित थी हिंदू राष्ट्र की आकांक्षा, जो अब परवान चढ़ रही है। यह देश को तोड़ने वाला नारा है, यह दक्षिण भारत को उत्तर भारत से अलग करने वाला नारा है।

यह अकारण नहीं है कि हिंदी का उन्मादी परचम उठाने वाले हिंदुत्ववाद के भी समर्थक हैं। उनमें से अधिसंख्य लोग ऐसे हैं, जो वर्णाश्रमी जातिवाद के लाभार्थी होने के कारण जातिदंश और जातिभेद से ही इंकार करते हैं। उनके लिए सामाजिक न्याय की अवधारणा सामाजिक समरसता को खंडित करने वाली है। इसीलिए गैर उच्च सवर्ण उनके लिए नॉट फाउंड सूटेबल’ की कोटि में आते हैं।

स्वीकार करना होगा कि हिंदी वह चोर दरवाजा है, जो अन्य भारतीय भाषाओं की कीमत पर हिंदुत्व का राजमार्ग प्रशस्त करता है। हिंदी के कितने उन्मादी समर्थकों को पता है कि उत्तर प्रदेश की दूसरी राजभाषा होने के बावजूद सरकारी कार्यालयों के नामपट्टों तक से उर्दू अदृश्य कर दी गई है।

आखिर क्यों लखनऊ के उर्दू, अरबी, फारसी यूनिवर्सिटी का नाम बदलकर भाषा विश्विद्यालय रख दिया गया।
कुछ समय पहले यह ऐलान भी हुआ था कि अब सरकारी विज्ञप्तियां संस्कृत में भी जारी की जाएंगी। यह संस्कृत किस जनता की भाषा है, संस्कृत में कौन से अखबार और पत्रिकाएं छपती हैं , जिनमें यह विज्ञप्तियां भेजी जाएंगी?

उर्दू के शब्दों को हटाने का अभियान क्यों शुरू किया गया? संस्कृत को बचाने और उर्दू को समाप्त करने के इस नजरिए का विरोध न करके आप 'हिंदी, हिंदू, हिंदुस्थान' की उसी सोच को खाद पानी दे रहे हैं, जो विभाजन का एक कारक थी।

जी, यह वही बहुसंख्यकवाद है, जो जनतांत्रिकता विरोधी है। हिंदी पढ़िए, लिखिए, लेकिन उसके जयगान में अंतर्निहित उस कथित सांस्कृतिक राष्ट्रवादी सोच की अनदेखी मत कीजिए, जो इस बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और विविधतावादी देश को एक रंग में रंगने की दुराभिसंधि रच रहा है।

याद कीजिए, संविधान सभा में वे कौन से लोग थे, जिन्होंने गांधी, प्रेमचंद और नेहरू की 'हिंदुस्तानी' भाषाई अवधारणा को नकारकर वर्चस्ववादी संस्कृतनिष्ठ हिंदी को स्वीकार करने का दबाव बनाया था, और महज एक वोट के बहुमत से हिंदी के वर्तमान सरकारी रूप को स्वीकृत कराया था।

जिस भाषा को कमोबेश समूचे भारत में समझा जाता है, वह हिंदी, उर्दू के सहजबोध से बनी ‘हिंदुस्तानी’ है, न समझ में आने वाली शुद्ध हिंदी नहीं। इसलिए भाषा को लेकर हिंदुस्तानी नजरिया अपनाइए, हिंदुत्ववादी नहीं।


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