✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई | सरकार 2028 तक भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का ढोल पीट रही है, लेकिन हकीकत धरातल पर दम तोड़ रही है।
पिछले सप्ताह भारतीय रिजर्व बैंक के मुख्यालय में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रथम उप प्रबंध निदेशक गीता गोपीनाथ और गवर्नर संजय मल्होत्रा की मुलाकात ने आर्थिक गलियारों में खलबली मचा दी है।
यह बैठक महज शिष्टाचार नहीं, बल्कि उस आर्थिक संकट की आहट है, जिसे सरकार पिछले एक दशक से ‘इवेंट मैनेजमेंट’ के शोर में दबाती आई है। ईरान संघर्ष और वैश्विक अस्थिरता के बीच यह मुलाकात उस अलार्म की तरह है, जिसे नीति-निर्माता लगातार नजरअंदाज कर रहे हैं।
डेटा की पारदर्शिता पर आईएमएफ ने भारत को सी-ग्रेड दिया है, जो दुनिया के सामने हमारी विश्वसनीयता पर बड़ा धब्बा है। एनपीए की समस्या सुलझाने के नाम पर बैंकों का विलय किया गया, जिससे रोजगार और कम हो गए। शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट में की गई कटौती ने आने वाली पीढ़ी को भी जोखिम में डाल दिया है।
गीता गोपीनाथ ने भारत की विकास गाथा को ‘रोजगार-विहीन’ कहकर आईना दिखा दिया है। यहां तरक्की का शोर तो है, लेकिन युवाओं के हाथ खाली हैं। जमीन, जेहन और न्याय के बुनियादी सुधारों की जगह सरकार ने सिर्फ आंकड़ों का भ्रम पाला है, जिसमें ‘विकसित भारत’ का सपना हकीकत की जमीन पर दम तोड़ रहा है।
आंकड़ों की बाजीगरी देखिए, 2014 में हमारी प्रति व्यक्ति आय 1,540 डॉलर थी, जो 2026 में 2,800 डॉलर तक पहुंची है। वहीं हमारा पड़ोसी बांग्लादेश 3,100 डॉलर के स्तर पर खड़ा है। हम उनसे काफी पीछे हैं।
दूसरी ओर, विदेशी कर्ज 457 अरब डॉलर से उछलकर 736 अरब डॉलर के पार चला गया है। व्यापार घाटा तीन गुना होकर 24 लाख करोड़ रुपये तक जा पहुंचा है। आत्मनिर्भर होने का दावा करने वाली सरकार का आयात बिल यह बता रहा है कि हम अंदर से कितने खोखले होते जा रहे हैं।
सबसे भयावह स्थिति नौकरियों की है। रेलवे के 63,000 पदों के लिए 1.9 करोड़ आवेदन आए हैं। स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया की रिपोर्ट कहती है कि 40 प्रतिशत स्नातक बेरोजगार हैं। एक तरफ निजी क्षेत्र छंटनी कर रहा है, तो दूसरी तरफ सार्वजनिक उपक्रमों में नौकरियां 13.5 लाख से सिमटकर 7.8 लाख रह गई हैं। सरकार के पास नौकरियां देने का कोई रोडमैप नहीं है, उल्टे विदेश मंत्रालय जैसे अहम विभागों में 32 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं, जो हमारी लचर विदेश नीति का प्रमाण हैं।
विदेश नीति में भी ‘मीठे बोल’ वाले सलाहकारों ने देश को चौराहे पर खड़ा कर दिया है। जहाँ दुनिया में ‘नो’ कहने वाले सलाहकारों का सम्मान होता है, वहां भारत में ‘लेट्स डू इट सर’ कहने वालों की फौज खड़ी है। नतीजा यह है कि हम एक ऐसी कूटनीतिक और आर्थिक भूलभुलैया में फंस गए हैं, जहां से बाहर निकलने का रास्ता नजर नहीं आ रहा।
आर्थिक मामलों के जानकार कहते हैं कि गीता गोपीनाथ की कड़वी सलाह को राष्ट्रवाद के शोर में दबाना अब देश को और महंगा पड़ रहा है। यदि अभी भी बुनियादी आर्थिक सुधारों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह विकास केवल आंकड़ों का एक मायाजाल बनकर रह जाएगा और देश की जनता खाली थाली और बेरोजगार हाथों के साथ खड़ी रह जाएगी।
