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मोदी सरकार का ‘विधायी दंभ’ धराशायी: संसद में तीन बड़े विधेयकों की शर्मनाक विफलता

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गठबंधन की बैसाखी पर टिकी भाजपा सरकार ने महिला आरक्षण की आड़ में रची थी सत्ता विस्तार की साजिश, विपक्ष ने सदन में ही कर दिया ‘खेल’

✍️ प्रहरी संवाददाता, नई दिल्ली | संसद के गलियारों में अब तक ‘अजेय’ मानी जाने वाली मोदी सरकार का दम 16 अप्रैल को उस वक्त फूल गया, जब उन्हें अपने ही तीन प्रमुख विधेयकों को सदन से वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। गठबंधन की मजबूरी के बीच भाजपा सरकार की विधायी ताकत को उस समय गहरा धक्का लगा, जब संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026, परिसीमन विधेयक 2026 और संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक 2026 दो-तिहाई बहुमत की संवैधानिक दहलीज पर आकर ढेर हो गए।

राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि महिला आरक्षण के नाम पर लाए गए इन विधेयकों की आड़ में भाजपा अपनी सत्ता विस्तार और चुनावी परिसीमन की उस महत्वाकांक्षा को साधना चाहती थी, जो लंबे समय से पार्टी के एजेंडे में थी। 298 सदस्यों के समर्थन के बावजूद विपक्ष के 230 मतों ने सरकार के उस दंभ को आईना दिखा दिया, जिसने 2014 से 2024 तक संसद में हर एजेंडे को बिना किसी अवरोध के कानून में बदलने का सिलसिला कायम रखा था। इस अप्रत्याशित हार के बाद संसदीय कार्य मंत्री को न केवल विधेयक वापस लेने पड़े, बल्कि शेष विधायी कार्य सूची को भी स्थगित करने के लिए विवश होना पड़ा।

12 वर्षों की विधायी रफ्तार के आगे गठबंधन की दीवार

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक, 16वीं लोकसभा (2014-2019) में 133 और 17वीं लोकसभा (2019-2024) में 221 विधेयकों को कानून बनाने वाली भाजपा सरकार ने 18वीं लोकसभा के बीते दो वर्षों में भी अपनी विधायी सक्रियता की गति बरकरार रखी थी। इस अवधि में वित्त विधेयक 2026, जन विश्वास (संशोधन) विधेयक 2026, आंध्र प्रदेश पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2026, वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024, इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स बिल 2025, इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरैप्सी कोड (संशोधन) विधेयक 2025 के साथ ही सस्टेनेबल न्यूक्लियर एनर्जी बिल, नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस बिल और इंडियन पोर्ट्स बिल जैसे दर्जनों कानून बिना किसी बड़े अवरोध के पारित हुए थे।

2014 से 2024 तक सरकारी विधेयकों की निर्बाध स्वीकृति का इतिहास रचने वाली भाजपा के लिए 16 अप्रैल का दिन विधायी ‘फ्लॉप शो’ के रूप में दर्ज हो गया है। महिला आरक्षण क़ानून और डीलिमिटेशन से जुड़ा 131वां संवैधानिक संशोधन विधेयक शुक्रवार को लोकसभा में गिर गया। विपक्ष ने इन विधेयकों को लेकर सरकार के एजेंडे पर सवाल उठाए थे।

जन विश्वास और आंध्र प्रदेश पुनर्गठन जैसे विधेयकों को पास कराकर साख बचाने की सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद, सदन के भीतर की यह विधायी विफलता यह स्पष्ट कर रही है कि अब ‘सुपर-मेजॉरिटी’ का युग बीत चुका है और गठबंधन की नई मजबूरियों ने सरकार की सत्ता-लालसा पर लगाम लगा दी है।

 


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