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आरक्षण की ‘सियासी चाशनी’ में परिसीमन का ज़हर!
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मोदी के ‘मिशन 850’ से दक्षिण भारत के राज्यों का मुखर विरोध
विशेष रिपोर्ट: वरिष्ठ राजनीतिक संपादक
✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई | संसद के विशेष सत्र में मोदी सरकार ने ‘महिला आरक्षण’ का जो पासा फेंका है, उसने देश के सियासी भूगोल को दो हिस्सों में फाड़ दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लोकसभा में हुंकार भरते हुए कहा कि “विरोध करने वालों को बड़ी कीमत चुकानी होगी”, तो यह केवल विपक्ष को दी गई चेतावनी नहीं थी, बल्कि 2029 की वह बिसात थी जहाँ ‘नारी शक्ति’ को ढाल बनाकर ‘सत्ता के स्थायीकरण’ का खेल रचा गया है।
प्रधानमंत्री की “बहनों पर भरोसा करें” वाली भावुक अपील के पीछे एक ऐसा ‘डेटा-सत्य’ दबा है जो बीजेपी की कथनी और करनी पर सवाल खड़े करता है। हकीकत यह है कि अपनी पार्टी में महिलाओं को टिकट देने और संगठन में हिस्सेदारी देने में बीजेपी खुद फिसड्डी रही है। सदन में सर्वाधिक 31 महिला सांसदों वाली पार्टी होने के बावजूद बीजेपी ने कैबिनेट में महिलाओं को मात्र 12.92% की जगह दी, जो इस पूरे शोर के बीच एक कड़वा विरोधाभास है।
असली खेल ‘महिला आरक्षण’ के उस पेंच में छिपा है जिसे ‘भविष्य की जनगणना’ और ‘परिसीमन’ से जोड़ दिया गया है। केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने जब 850 सीटों वाली नई लोकसभा और 272 महिला सांसदों का गणित पेश किया, तो विपक्ष के माथे पर बल पड़ गए। विपक्ष का आरोप है कि आरक्षण तो केवल एक ‘मृगतृष्णा’ है, असली मकसद परिसीमन के जरिए उन उत्तर भारतीय राज्यों में सीटें बढ़ाना है जहाँ बीजेपी अजेय है। यानी, महिलाओं को हक कब मिलेगा यह तय नहीं, लेकिन उत्तर भारत के दम पर संसद पर कब्जा पक्का करने की तैयारी पूरी है।
राहुल गांधी ने इसे ‘बीजेपी का सबसे खतरनाक खेल’ करार देते हुए सीधे तौर पर इसे ओबीसी, दलित और आदिवासियों के हक पर डाका बताया है। राहुल ने असम और जम्मू-कश्मीर का उदाहरण देते हुए आगाह किया कि सरकार निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को अपनी सुविधा के अनुसार ‘काट-छाँट’ (Maneuvering) रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि कैसे एक सीट पर 25 लाख और दूसरी पर 8 लाख मतदाता हो सकते हैं? उनके मुताबिक, यह जनगणना के आंकड़ों को दरकिनार कर सत्ता हथियाने की एक बड़ी साजिश है।
इधर, दक्षिण भारत में इस विधेयक ने ‘क्षेत्रीय अस्मिता’ की आग सुलगा दी है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने काले कपड़े पहनकर विरोध जताया और इसे ‘तमिलों पर हमला’ घोषित कर दिया। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और कपिल सिब्बल ने साफ किया कि परिसीमन उन राज्यों के साथ गद्दारी है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में मिसाल पेश की।
सिब्बल के आंकड़ों के अनुसार, परिसीमन के बाद यूपी और तमिलनाडु की सीटों का अंतर 41 से बढ़कर 61 हो जाएगा, जिससे दक्षिण भारत की राजनीतिक हैसियत ‘शून्य’ की ओर बढ़ जाएगी।
बीजेपी प्रवक्ता शहज़ाद पूनावाला भले ही इसे महिलाओं का ’30 साल का इंतज़ार’ खत्म होना बता रहे हों, लेकिन सदन का अनुपात कुछ और ही कहानी कहता है।
वर्तमान लोकसभा में मात्र 14% महिलाएं हैं और टीएमसी जैसे दल प्रतिनिधित्व के मामले में बीजेपी से कहीं आगे हैं। अब 16 से 18 अप्रैल के बीच होने वाली यह ऐतिहासिक बहस यह तय करेगी कि क्या यह बिल वाकई महिलाओं को सशक्त करेगा या फिर यह ‘नारी शक्ति’ की आड़ में दक्षिण को हाशिए पर धकेलने और परिसीमन के जरिए दिल्ली की सत्ता पर ‘अमरत्व’ प्राप्त करने का एक सोचा-समझा सियासी ‘दांव’ है।
