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35.8 अरब डॉलर का कर्ज… और रुपये की गिरावट ने बढ़ा दिया असली बोझ! क्या सच में सस्ता है विदेशी कर्ज?

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  • 2014 के बाद विश्व बैंक से 35.8 अरब डॉलर का लोन, असली बोझ 50% तक बढ़ा

  • डॉलर में लिया गया कर्ज, रुपये में भारी गिरावट ने दिया झटका

✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई, नई दिल्ली | विकास योजनाओं के लिए लिया गया विदेशी कर्ज अब रुपये की गिरावट के कारण कहीं अधिक महंगा पड़ रहा है। भारत सरकार ने अप्रैल 2014 से अगस्त 2025 के बीच वर्ल्ड बैंक ग्रुप से कुल 158 ऋण समझौते किए, जिनकी राशि 35.8 अरब अमेरिकी डॉलर रही। यह जानकारी हाल ही में वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग (डीईए) के आधिकारिक आंकड़ों में सामने आई है।

यह कर्ज बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, कौशल विकास और आपदा प्रबंधन जैसी योजनाओं के लिए लिया गया। हाल के वर्षों में हिमाचल प्रदेश आपदा पुनर्निर्माण, असम पहाड़ी सड़क परियोजना और कौशल विकास कार्यक्रमों से जुड़े नए ऋण भी मंजूर किए गए हैं, जिससे विदेशी उधारी का दायरा लगातार बढ़ रहा है।

सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि यह उधारी मुख्यतः इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट (अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक) के माध्यम से ली गई, जो बाजार आधारित शर्तों पर कर्ज देता है। भारत अब रियायती ऋण देने वाली आईडीए व्यवस्था से बाहर है, जिसके बाद नई उधारी सीधे बाजार दरों से जुड़ गई है।

दिसंबर 2025 तक विश्व बैंक का भारत पर कुल बकाया कर्ज लगभग 34–35 अरब डॉलर के दायरे में आंका गया है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक का हिस्सा करीब 21–22 अरब डॉलर और पुराने आईडीए ऋण लगभग 13 अरब डॉलर हैं।

कागजों में यह कर्ज सस्ता दिखता है। अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक के ऋण परिवर्तनीय ब्याज दर पर आधारित होते हैं, जो अमेरिकी संदर्भ दर (एसओएफआर) से जुड़े होते हैं और उस पर 1.2 से 2.3 प्रतिशत तक अतिरिक्त अंतर जोड़ा जाता है। लेकिन असली कहानी ब्याज दर में नहीं, बल्कि रुपये की कमजोरी में छिपी है।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, 2014 में डॉलर के मुकाबले रुपया औसतन 55 के स्तर पर था। अप्रैल 2026 तक यही दर 93–94 के दायरे में पहुंच चुकी है। इसका सीधा असर कर्ज की वास्तविक लागत पर पड़ा है। उदाहरण के लिए 2014 में लिया गया 1 अरब डॉलर का कर्ज उस समय करीब 5,500 करोड़ रुपये के बराबर था, जो अब बढ़कर लगभग 9,400 करोड़ रुपये बैठता है। यानी बिना एक डॉलर अतिरिक्त लिए ही देनदारी में 50 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हो चुकी है।

सरकारी आंकड़ों में विश्व बैंक को अलग से चुकाए गए ब्याज का विवरण उपलब्ध नहीं है, क्योंकि इसे कुल बाहरी ऋण सेवा के तहत समेकित रूप में दर्शाया जाता है। हालांकि आधिकारिक आकलन यह बताते हैं कि बहुपक्षीय संस्थाओं से लिया गया कर्ज लंबी अवधि और अपेक्षाकृत कम लागत वाला होता है।

सरकार का कहना है कि भारत का कुल बाहरी कर्ज अब भी सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में लगभग 19 प्रतिशत के आसपास है, जिसे नियंत्रित स्तर माना जाता है। वहीं विनिमय दर का निर्धारण घरेलू और वैश्विक कारकों से होता है और इसका प्रबंधन केंद्रीय बैंक द्वारा किया जाता है।

इंटरनेशनल मॉनिटरिली फंड (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) और विश्व बैंक से लिए गए इस कर्ज का वास्तविक बोझ अब ब्याज दरों से कम और रुपये की गिरावट से ज्यादा तय हो रहा है। आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि विकास के लिए लिया गया विदेशी कर्ज अब विनिमय दर के दबाव में और महंगा पड़ रहा है।


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