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रिकॉर्ड फंड जुटाने के बाद भी निवेशकों के पोर्टफोलियो में भारी गिरावट

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  • आईपीओ बाजार की ‘गोल्ड रश’ खत्म: 6 लाख करोड़ जुटाने के बाद करीब आधे शेयर इश्यू प्राइस से नीचे

  • 2020 से 2025 तक आईपीओ का लेखा-जोखा: कंपनियां मालामाल, निवेशक कंगाल

✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई | भारतीय पूंजी बाजार ने 2020 से 2025 के बीच आईपीओ के माध्यम से 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक की रिकॉर्ड पूंजी तो जुटाई, लेकिन यह निवेश का महाकुंभ खुदरा निवेशकों के लिए ‘वेल्थ डिस्ट्रक्शन’ का बड़ा जरिया साबित हुआ है।

ताजा आंकड़ों का विश्लेषण एक चौंकाने वाली सच्चाई उजागर करता है। बीते छह वर्षों में सूचीबद्ध हुई करीब 370 से 380 कंपनियों में से लगभग 48 प्रतिशत आज अपने इश्यू प्राइस से नीचे कारोबार कर रही हैं। यह स्थिति उन निवेशकों के दावों की धज्जियां उड़ाती है जो लिस्टिंग के समय के ‘हाइप’ और ‘ओवर-सब्सक्रिप्शन’ को कंपनी की मजबूती का अंतिम पैमाना मानते थे।

लिस्टिंग गेन की चमक फीकी, निवेशकों का पैसा फंसा

वर्ष 2025 तक आते-आते बाजार की स्थिति बदतर होती गई। पिछले साल के आईपीओ पर गौर करें तो दिसंबर तक 59 प्रतिशत कंपनियां अपने लिस्टिंग मूल्य से नीचे फिसल चुकी थीं। निवेशकों के लिए सबसे बड़ा झटका यह है कि जो शेयर कभी मल्टी-बैगर होने का सपना दिखा रहे थे, उनमें से 35 से अधिक कंपनियों ने अपना आधे से अधिक बाजार मूल्य गंवा दिया है।

2024-25 में जुटाए गए भारी फंड के बावजूद, प्रमोटर की आक्रामक बिकवाली और अत्यधिक वैल्युएशन (ओवर-वैलुएशन) ने छोटे निवेशकों के पोर्टफोलियो को बुरी तरह झकझोर कर रख दिया है।

2020 में महामारी के प्रभाव के चलते 15 आईपीओ आए, जिससे 26,613 करोड़ रुपये जुटाए गए, जबकि 2021 में 66 आईपीओ के माध्यम से 1,30,558 करोड़ रुपये और 2022 में 39 आईपीओ से 63,279 करोड़ रुपये जुटाए गए। 2023 में 60 आईपीओ के जरिए 52,958 करोड़ रुपये, 2024 में 93 आईपीओ के जरिए 1,80,377 करोड़ रुपये, और 2025 में 108 आईपीओ के माध्यम से 1,83,432 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड निवेश प्राप्त हुआ।

हाइप के बजाय फंडामेंटल विश्लेषण की जरूरत

हालांकि, लिस्टिंग के बाद का प्रदर्शन निवेशकों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा। वर्ष 2025 में मीडियन लिस्टिंग गेन सिमटकर मात्र 3.8 प्रतिशत रह गया, जो बाजार में बढ़ते अत्यधिक मूल्यांकन का संकेत है। यह गिरावट स्पष्ट करती है कि शुरुआती ‘लिस्टिंग पॉप’ अब भरोसेमंद नहीं रहा।

बाजार के जानकारों के अनुसार, यह संकट ‘हाइप-ड्रिवन’ बाजार का प्रत्यक्ष परिणाम है। कंपनियां लिस्टिंग के दिन तक तो निवेशकों को लुभाने में सफल रहीं, लेकिन बाजार में आते ही उनके कमजोर फंडामेंटल्स बेनकाब हो गए। रिटेल निवेशक, जिन्हें अक्सर खराब परफॉर्मेंस वाले आईपीओ में फुल अलॉटमेंट मिलता है, अब 10 से 70 प्रतिशत तक के घाटे के दलदल में फंसे हुए हैं।

 


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