ताज़ा खबर
OtherPoliticsTop 10ताज़ा खबरबिज़नेसभारतराज्य

58% नियमित कर्मियों के पास लिखित अनुबंध नहीं, चार लेबर कोड से छंटनी हुई आसान

Share

कागजों पर बेरोजगारी घटी, पर काम के हक सिकुड़े

✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, नई दिल्ली | देश में बेरोजगारी दर घटने के सरकारी दावों के बीच भारतीय श्रम बाजार में कामगारों की सामाजिक सुरक्षा और अधिकारों की हकीकत बेहद चिंताजनक बनी हुई है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण यानी पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, गैर-कृषि क्षेत्र में नियमित वेतन या पगार पाने वाले 58 प्रतिशत कर्मचारियों के पास नौकरी का कोई लिखित अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) ही नहीं है। इतना ही नहीं, 47.3 प्रतिशत कर्मियों को सवेतन अवकाश का अधिकार हासिल नहीं है, जबकि 53.4 प्रतिशत कामगार किसी भी प्रकार के निर्दिष्ट सामाजिक सुरक्षा लाभ (पीएफ, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा) के दायरे से पूरी तरह बाहर हैं।

आंकड़ों की बाजीगरी के तहत 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग की बेरोजगारी दर 2017-18 के 6.1 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 3.2 प्रतिशत और महिला श्रम बल भागीदारी 23.3 से बढ़कर 41.7 प्रतिशत जरूर दर्ज हुई है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा सुरक्षित नौकरियों में तब्दील नहीं हुआ। कुल कार्यबल में 58.4 प्रतिशत आबादी स्वरोजगार और 19.8 प्रतिशत आकस्मिक मजदूरी में फंसी है। नियमित वेतनभोगी वर्ग महज 21.7 प्रतिशत पर सिमटा हुआ है, जिसमें ग्रामीण कामकाजी महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 7.8 प्रतिशत है।

नौकरी की गुणवत्ता के इस संकट के बीच केंद्र सरकार द्वारा 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समाहित कर बनाई गई चार श्रम संहितायें (लेबर कोड्स) भी विवादों के केंद्र में हैं। औद्योगिक संबंध संहिता के तहत छंटनी, कामबंदी और उपक्रम बंद करने के लिए पूर्व सरकारी अनुमति की अनिवार्यता को 100 कर्मचारियों की सीमा से बढ़ाकर 300 कर्मचारियों तक कर दिया गया है। इसके चलते 300 से कम कर्मियों वाली औद्योगिक इकाइयों में कर्मचारियों को कभी भी सेवामुक्त करने की खुली छूट मिल गई है, जिससे श्रमिकों की सामूहिक सौदेबाजी की ताकत कुंद हो रही है।

साथ ही हड़ताल के लिए 14 दिन के पूर्व नोटिस और सुलह के दौरान हड़ताल पर रोक से ट्रेड यूनियनों की आवाज दबाए जाने की आशंका गहरा गई है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की ‘डिसेंट वर्क’ अवधारणा जहां न्यूनतम पारिश्रमिक, कार्यस्थल सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण को बुनियादी शर्त मानती है, वहीं भारतीय श्रम सुधारों की यह नई दिशा संगठित रोजगार के नाम पर कामगारों को सिर्फ अनिश्चितता और असुरक्षा के हवाले कर रही है।

 


Share

Related posts

निजीकरण से पहले बीपीसीएल की कर्मचारियों को वीआरएस की पेशकश

samacharprahari

तीन किलोग्राम गांजे के साथ दो बदमाश गिरफ्तार

Girish Chandra

एनआईआरएफ रैंकिंग में आईआईटी मद्रास सर्वश्रेष्ठ संस्थान

samacharprahari

दाऊद का घर छोड़ा, कंगना का तोड़ा: फडणवीस

samacharprahari

462 इंफ्रा प्रोजेक्ट की मूल लागत में 4.38 लाख करोड़ की बढ़ोतरी

samacharprahari

इनपुट कर क्रेडिट देने के मामले में दो गिरफ्तार

samacharprahari