11 मार्च के आदेश से पुरानी नियुक्तियों पर आंच नहीं
नीति बनाने के लिए केंद्र को दो साल देने से भी अदालत का इनकार
✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई | नई दिल्ली | अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के नॉन-क्रीमी लेयर दर्जे और आरक्षण के लाभ को लेकर उपजे भ्रम को दूर करते हुए उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को स्थिति पूरी तरह साफ कर दी है। शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी है कि 11 मार्च 2026 को सुनाए गए उसके ऐतिहासिक फैसले का कानूनी आधार (रेशियो) पिछली तारीख यानी रेट्रोस्पेक्टिवली लागू नहीं होगा। अदालत के इस स्पष्टीकरण से केंद्र और राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों में पहले ही संपन्न हो चुकीं नियुक्तियों और संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की पिछली सिविल सेवा परीक्षाओं के तहत चयनित अभ्यर्थियों पर मंडरा रहा कानूनी विवाद खत्म हो गया है। इसके अलावा न्यायालय ने केंद्र सरकार की उस अर्जी को भी सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें पदों की समकक्षता तय करने और देशव्यापी एक समान नीति तैयार करने के नाम पर दो वर्ष की मोहलत मांगी गई थी।
मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने रेखांकित किया कि 11 मार्च के फैसले में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के 8 सितंबर 1993 के मूल आधिकारिक ज्ञापन (ऑफिस मेमोरेंडम) की भावना को स्पष्ट किया गया था। इसके तहत क्रीमी लेयर की पात्रता के लिए आर्थिक सीमा (वर्तमान में आठ लाख रुपये) जांचते समय उम्मीदवार के माता-पिता के वेतन और कृषि से होने वाली आय को गणना से बाहर रखना अनिवार्य है।
न्यायालय ने वर्ष 2004 के उस स्पष्टीकरण पत्र को मनमाना करार दिया था, जिसके आधार पर सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू) और बैंकों के कर्मचारियों के बच्चों को केवल वेतन के आधार पर आरक्षण के लाभ से बाहर कर दिया जाता था, जबकि समान वेतन वाले सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ मिलता था।
पीठ ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि 1993 के ज्ञापन के अनुसार स्थिति का पुनर्मूल्यांकन करने का यह कानूनी सिद्धांत केवल 11 मार्च 2026 के बाद की प्रक्रियाओं और लंबित मामलों पर ही प्रभावी रहेगा, और बंद हो चुकी पुरानी चयन प्रक्रियाओं को दोबारा नहीं खोला जाएगा।
प्रशासनिक स्तर पर नीति निर्माण के मुद्दे पर अदालत ने केंद्र सरकार के ढुलमुल रवैये को कतई स्वीकार नहीं किया। केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत के समक्ष दलील दी थी कि सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों और अन्य स्वायत्त निकायों में ग्रुप-ए और ग्रुप-बी के पदों की समकक्षता (इक्विवेलेंस ऑफ पोस्ट्स) निर्धारित करने, सभी संबंधित हितधारकों से व्यापक परामर्श करने और एक सुदृढ़ तंत्र तैयार करने के लिए उसे कम से कम दो वर्ष का समय दिया जाए।
अदालत ने सरकार की इस मांग को नामंजूर करते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि तीन दशक पुराने नियमों के क्रियान्वयन और विसंगतियों को दूर करने के लिए इतना लंबा वक्त नहीं दिया जा सकता और कार्यपालिका को बिना किसी अनावश्यक देरी के व्यवस्थागत सुधार सुनिश्चित करने होंगे।
