मेक इन इंडिया’ की सुस्त चाल पर एफडीआई का सरकारी ढोल
100 दिनों में 164 फंडों की कतार से क्या संवरेगा भारत का विनिर्माण क्षेत्र ?
अब 10 साल की खुली छूट देकर विदेशी सटोरियों की आरती उतारने की तैयारी
✍️ प्रहरी बिजनेस डेस्क, मुंबई | भारतीय वित्तीय बाजारों में विदेशी संस्थागत निवेशकों की सुस्त पड़ती भागीदारी, घरेलू इक्विटी में विदेशी हिस्सेदारी के 17 साल के सबसे निचले स्तर पर फिसलने और एशियाई मुद्राओं के बीच रुपये पर बने निरंतर दबाव के बीच केंद्र सरकार के नए फास्ट-ट्रैक प्रवेश मार्ग ‘स्वागत-एफआई’ ने वैश्विक पूंजी गलियारों में नई हलचल पैदा कर दी है।
1 जून से प्रभावी हुए इस नए सिंगल विंडो तंत्र के अमल में आने के महज 100 दिनों के भीतर दुनिया भर के 164 बड़े सॉवरेन वेल्थ फंडों, सरकारी पेंशन फंडों और संस्थागत प्रबंधकों ने भारत में पंजीकरण कराया है। नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) के आंकड़ों के अनुसार, इस व्यवस्था के शुरू होते ही ब्लैकरॉक, वैनगार्ड, स्टेट स्ट्रीट और फ्रैंकलिन टेम्पलटन जैसे दुनिया के सबसे बड़े एसेट मैनेजरों के निवेश ढांचे भारतीय बाजार में पंजीकृत हो चुके हैं। दक्षिण कोरिया के सॉवरेन फंड ‘कोरिया इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन’ (केआईसी) और मलेशिया के प्रमुख सरकारी पेंशन फंडों ने भी इस नई व्यवस्था के जरिए औपचारिकताएं पूरी कर ली हैं।
‘सिंगल विंडो ऑटोमैटिक एंड जनरलाइज्ड एक्सेस फॉर ट्रस्टेड फॉरेन इन्वेस्टर्स’ (SWAGAT-FI) ढांचे को विशेष रूप से उन कम जोखिम वाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए तैयार किया गया है, जो भारत में कुल विदेशी पोर्टफोलियो निवेश का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा नियंत्रित करते हैं। इसमें सॉवरेन फंड, पेंशन फंड, बीमा कंपनियां और विनियमित सार्वजनिक रिटेल फंड शामिल हैं। नियमों में किए गए सबसे बड़े रणनीतिक बदलाव के तहत इन बड़े निवेशकों को हर तीन साल में पंजीकरण नवीनीकरण के जटिल झंझटों और भारी अनुपालन लागत से मुक्ति देते हुए एकमुश्त 10 साल की वैधता दी गई है।
हालांकि डिपॉजिटरी के आंकड़ों से यह स्पष्ट नहीं होता कि इन 164 पंजीकरणों के जरिए कितनी प्रत्यक्ष पूंजी भारत आई है, लेकिन पूंजी प्रवाह के आंकड़े बताते हैं कि अगस्त तक विदेशी निवेशकों ने घरेलू इक्विटी में शुद्ध रूप से 702 अरब रुपये (लगभग 7.34 अरब डॉलर) का भारी निवेश किया। सितंबर में वैश्विक अनिश्चितताओं के चलते 278.1 अरब रुपये की निकासी के साथ धारणा में कुछ सुस्ती भी दर्ज की गई।
पोर्टफोलियो और बॉन्ड बाजार में कागजी औपचारिकताओं को आसान बनाकर विदेशी पूंजी आकर्षित करने की यह ताजा कवायद दरअसल पिछले 12 वर्षों की प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीतियों की उस विसंगतिपूर्ण जमीनी हकीकत के बीच सामने आई है, जिसने भारतीय विनिर्माण और दीर्घकालिक पूंजी निर्माण को अपेक्षित ऊंचाई नहीं दी। वर्ष 2014 में शुरू हुए ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के तहत रक्षा, रेलवे, कोयला खनन, बीमा, नागरिक उड्डयन और एकल ब्रांड खुदरा जैसे दर्जनों संवेदनशील क्षेत्रों में ऑटोमैटिक रूट से 100 प्रतिशत तक एफडीआई की खुली छूट दी गई थी।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआईआईटी) के आंकड़े बताते हैं कि कागजी तौर पर भारत में कुल संचयी सकल एफडीआई प्रवाह ने वित्तीय वर्ष 2021-22 में 84.8 अरब डॉलर का अब तक का सर्वोच्च रिकॉर्ड छुआ था, लेकिन इस नीतिगत उदारीकरण की भीतरी तस्वीर बेहद असंतुलित और चिंताजनक साबित हुई।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के ‘हैंडबुक ऑफ स्टैटिस्टिक्स ऑन इंडियन इकोनॉमी’ और हालिया बुलेटिन के आंकड़े इस नीतिगत विफलता को पूरी तरह बेपर्दा करते हैं। आरबीआई के डेटा के अनुसार, पिछले तीन वर्षों के दौरान भारत में ‘शुद्ध एफडीआई’ (नेट एफडीआई) में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जहां पुराने विदेशी निवेशकों द्वारा अपने मुनाफे को देश से बाहर ले जाने (रिपैट्रिएशन) और पूंजी निकालने की रफ्तार नए निवेश से कहीं अधिक तेज हो गई।
वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत का शुद्ध एफडीआई गिरकर करीब 10.6 अरब डॉलर पर आ गया, जो उससे पिछले वित्त वर्ष के 28 अरब डॉलर के मुकाबले 62 प्रतिशत से अधिक का भारी गोता था और पिछले डेढ़ दशक के सबसे निचले स्तरों में दर्ज किया गया।
इन 12 वर्षों की नीतिगत नाकामियों का सबसे बड़ा प्रमाण यह रहा कि आक्रामक उदारीकरण के बावजूद कुल एफडीआई का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा केवल सेवा क्षेत्र, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, आईटी और वित्तीय सेवाओं तक ही सीमित रह गया, जबकि विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) का हिस्सा 15 से 20 प्रतिशत के दायरे में ही सिमटकर दम तोड़ता रहा।
सरकार ने जिन कारखानों और असेंबली लाइनों के जरिए करोड़ों रोजगार पैदा करने और भारत को वैश्विक फैक्ट्री बनाने का खाका खींचा था, वह धरातल पर साकार नहीं हो सका। इसके मुख्य कारणों में भूमि अधिग्रहण की जटिलताएं, राज्यों के स्तर पर श्रम सुधारों का अधूरा क्रियान्वयन, महंगी वाणिज्यिक बिजली, बंदरगाहों तक अत्यधिक लॉजिस्टिक्स लागत और आयात शुल्कों में बार-बार किए जाने वाले मनमाने नीतिगत बदलाव रहे, जिन्होंने विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दीर्घकालिक पूंजी लगाने से झिझकने पर मजबूर किया।
इसके साथ ही, अप्रैल 2020 में जारी ‘प्रेस नोट 3’ के तहत भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों (विशेष रूप से चीन) के सभी प्रत्यक्ष निवेशों के लिए अनिवार्य सरकारी मंजूरी की शर्त ने विनिर्माण आपूर्ति श्रृंखलाओं को गहरा झटका दिया। चीन से आने वाले महत्वपूर्ण तकनीकी उपकरणों, ऑटो कंपोनेंट्स और इलेक्ट्रॉनिक्स हार्डवेयर के निवेश प्रस्ताव वर्षों तक सरकारी फाइलों में अटके रहे, जिसका सीधा नकारात्मक असर घरेलू उत्पादन और नए संयंत्रों की स्थापना पर पड़ा। विश्व बैंक के वैश्विक विनियामक सूचकांकों और विभिन्न आर्थिक अध्ययनों ने भी रेखांकित किया है कि कर प्रणाली की अनिश्चितता और अनुबंधों को कानूनी रूप से लागू कराने (एनफोर्समेंट ऑफ कॉन्ट्रैक्ट्स) में लगने वाले लंबे अदालती समय ने वैश्विक कंपनियों को वियतनाम, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे अधिक प्रतिस्पर्धी देशों की ओर रुख करने पर मजबूर किया।
ऐसे में अब ‘स्वागत-एफआई’ के 10-वर्षीय पंजीकरण और सरलीकृत नियमों के जरिए संस्थागत पूंजी को खींचने का नया प्रयास यह साबित करता है कि सरकार अब केवल इक्विटी और बॉन्ड बाजार के बड़े विदेशी फंडों के सहारे उस निवेश घाटे की भरपाई करने की जुगत में है।
