✍️ विशेष अंतरराष्ट्रीय डेस्क, वॉशिंगटन/बीजिंग | अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की प्रस्तावित शिखर वार्ता से पहले ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री सबसे अहम मुद्दों में शामिल हो गई है। मामले से परिचित सूत्रों के अनुसार, शी ट्रंप के सामने 1982 के अमेरिका-चीन संयुक्त विज्ञप्ति का हवाला देते हुए ताइवान को नए अमेरिकी हथियारों की बिक्री रोकने और पहले से ऑर्डर किए गए हथियारों की आपूर्ति पर भी रोक लगाने की मांग कर सकते हैं। शी के बुधवार को वॉशिंगटन पहुंचने और गुरुवार को ट्रंप के साथ औपचारिक वार्ता का कार्यक्रम प्रस्तावित है।
बीजिंग अपनी मांग के समर्थन में 17 अगस्त 1982 के संयुक्त विज्ञप्ति के उस प्रावधान का हवाला दे सकता है, जिसमें अमेरिका ने ताइवान को हथियारों की बिक्री को धीरे-धीरे कम करने और ताइवान को दीर्घकालिक हथियार आपूर्ति की नीति न अपनाने की बात कही थी। चीन लंबे समय से इसी प्रावधान को आधार बनाकर अमेरिकी हथियार बिक्री का विरोध करता रहा है।
हालांकि, 1982 के समझौते की व्याख्या को लेकर दोनों देशों का रुख अलग रहा है। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रॉनल्ड रीगन के प्रशासन से जुड़े दस्तावेजों में हथियार बिक्री में कमी को चीन की ओर से ताइवान मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान की प्रतिबद्धता से जोड़ा गया था। अमेरिकी विदेश विभाग के रिकॉर्ड बताते हैं कि वॉशिंगटन और बीजिंग ने समझौते के इन प्रावधानों की अलग-अलग व्याख्या बनाए रखी है।
अमेरिका की ताइवान नीति केवल 1982 के संयुक्त विज्ञप्ति तक सीमित नहीं है। ताइवान रिलेशंस एक्ट के तहत वॉशिंगटन की नीति ताइवान को अपनी रक्षा के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध कराने की रही है। इसी बीच, सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने दिसंबर में ताइवान के लिए करीब 11 अरब डॉलर के हथियार पैकेज को मंजूरी दी थी, जबकि लगभग 14 अरब डॉलर का एक अन्य पैकेज अभी लंबित है।
शी की प्रस्तावित वॉशिंगटन यात्रा ऐसे समय हो रही है जब अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक और रणनीतिक मुद्दों पर बातचीत भी जारी है। ऐसे में ताइवान को हथियारों की बिक्री पर बीजिंग की मांग दोनों देशों के बीच व्यापक वार्ता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।
