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वाजपेयी बनाम मोदी: गठबंधन के समझौतों से पूर्ण बहुमत के दबदबे तक, आर्थिक फैसलों और सामाजिक प्रयोगों की मार का तथ्यात्मक लेखा-जोखा

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  • पार्ट 1:  आर्थिक झटके, पेंशन की बलि और सामाजिक-जातिगत ताने-बाने पर कड़े प्रयोग

✍️  स्पेशल स्टोरी / खास रपट
 आर आर यादव

भारतीय राजनीति में दक्षिणपंथी शासन के दो अलग-अलग अध्यायों – अटल बिहारी वाजपेयी के गठबंधन काल और नरेंद्र मोदी के पूर्ण बहुमत वाले आक्रामक केंद्रीय शासन- का वास्तविक मूल्यांकन केवल राजनीतिक बयानों से नहीं, बल्कि उस कीमत से होता है, जो देश के वेतनभोगी, छोटे कारोबारी और हाशिए पर खड़े तबकों ने अपनी आजीविका से चुकाई।
वाजपेयी ने 24 दलों की गठबंधन मजबूरियों के बीच जहां राजकोषीय अनुशासन के नाम पर सरकारी ढांचा समेटने और सार्वजनिक संपत्तियों के निजीकरण की नींव रखी, वहीं मोदी ने पूर्ण राजनीतिक आधिपत्य के सहारे वैचारिक और संस्थागत ढांचे को ऐसे अप्रत्याशित झटकों से हिला दिया, जिसने असंगठित बाजार और आम नागरिक के रोजमर्रा के जीवन को सीधे प्रभावित किया।

पेंशन की बलि बनाम नोटबंदी का आघात

आर्थिक फैसलों के मोर्चे पर दोनों ही दौर में लिए गए नीतिगत निर्णयों ने मध्यम वर्ग और कामगारों की भविष्य की सुरक्षा पर गहरी चोट की। वाजपेयी सरकार ने भारतीय इतिहास में पहली बार अलग से विनिवेश मंत्रालय का गठन कर बाल्को, हिंदुस्तान जिंक और मारुति जैसी लाभप्रद सार्वजनिक कंपनियों में सरकारी हिस्सेदारी आक्रामक तरीके से बेची। इसके चलते सार्वजनिक क्षेत्र में सुरक्षित रोजगार का दायरा तेजी से घटा और ठेका मजदूरी का विस्तार हुआ।

इसी दौर में राजकोषीय घाटा कम करने के तर्क पर 1 जनवरी 2004 से पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) को समाप्त कर न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) की शुरुआत की गई, जिसने लाखों केंद्रीय और राज्य कर्मचारियों से उनकी सुनिश्चित सेवानिवृत्ति आय छीन ली और जिसे लेकर उपजा जन-असंतोष दो दशक बाद भी देश भर में सुलग रहा है।

दूसरी तरफ, मोदी सरकार ने आर्थिक मोर्चे पर ऐसे संरचनात्मक प्रयोग किए, जिनका स्वतंत्र भारत के इतिहास में कोई पूर्व उदाहरण नहीं था। 8 नवंबर 2016 को अचानक की गई नोटबंदी के जरिए देश में प्रचलित 86 प्रतिशत मुद्रा को रातों-रात अमान्य कर दिया गया। इस फैसले ने नकदी पर निर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था, दैनिक वेतनभोगियों और छोटे-मझोले उद्योगों (एमएसएमई) की रीढ़ तोड़ दी।

नकदी संकट के चलते देश भर में हफ्तों तक बैंकों के बाहर अफरा-तफरी मची रही और अनगिनत छोटे विनिर्माण कारखाने हमेशा के लिए बंद हो गए। इसके तुरंत बाद आधी-अधूरी तकनीकी तैयारियों के बीच जुलाई 2017 में लागू किए गए जीएसटी ने जटिल कानूनी अनुपालन के चलते असंगठित क्षेत्र और छोटे व्यापारियों पर भारी वित्तीय बोझ डाला। हालांकि डिजिटल भुगतान तंत्र और औपचारिक कर संग्रह का दायरा विस्तृत हुआ, लेकिन कॉरपोरेट टैक्स में भारी कटौती और सरकारी संपत्तियों के मुद्रीकरण (एसेट मोनेटाइजेशन) ने आय विषमता की खाई को और गहरा कर दिया।

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और वैचारिक एजेंडा

सामाजिक ताने-बाने और धार्मिक संतुलन के मामले में दोनों सरकारों के तौर-तरीकों ने अलग-अलग स्तरों पर देश को झकझोरा। वाजपेयी सरकार ने गठबंधन सहयोगियों के दबाव के चलते अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, समान नागरिक संहिता और अनुच्छेद 370 जैसे मुख्य वैचारिक मुद्दों को साझा न्यूनतम कार्यक्रम के तहत ठंडे बस्ते में रखा। इसके बावजूद वर्ष 2002 के गुजरात दंगों के दौरान केंद्र सरकार की कथित विफलता और राजधर्म के पालन में ढिलाई ने देश के धार्मिक अल्पसंख्यकों में पहली बार सत्ता के संरक्षण को लेकर गहरा अविश्वास पैदा किया।

इसके उलट, मोदी सरकार ने पूर्ण बहुमत के संख्याबल के सहारे अपने मूल वैचारिक एजेंडे को सीधे कानूनों और नीतियों में बदल दिया। तीन तलाक पर दंडात्मक कानून और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के क्रियान्वयन ने समाज में ध्रुवीकरण को तेज किया। सीएए और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के विरोध में देशव्यापी धरने-प्रदर्शन हुए, जिसके परिणाम स्वरूप उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भीषण सांप्रदायिक दंगे भड़के।

मुख्यधारा के विमर्श में बहुसंख्यकवादी राजनीति के प्रभाव ने धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुस्लिम समुदाय के भीतर असुरक्षा की भावना को बढ़ाया, भले ही केंद्र की प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी), मुफ्त राशन और आवास जैसी कल्याणकारी योजनाओं का वितरण बिना किसी भेदभाव के सभी वर्गों तक पहुंचा।

आरक्षण की सीमा टूटी, जाति गणना पर चुप्पी

सामाजिक न्याय और आरक्षण व्यवस्था के पटल पर भाजपानीत दोनों सरकारों के कार्यकाल में वंचित तबकों की अपेक्षाओं को नीतिगत स्तर पर किनारा किया गया। वाजपेयी सरकार ने मंडल आयोग के बाद के दौर में यथास्थिति बनाए रखी और सवर्ण कोर वोटबैंक के दबाव में न तो किसी नए जातिगत आरक्षण का विस्तार किया और न ही पिछड़े वर्गों की वास्तविक स्थिति के आकलन की कोई ठोस पहल की।

वहीं, मोदी सरकार ने 103वें संविधान संशोधन के जरिए सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के लिए 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू करके इंदिरा साहनी मामले में तय 50 प्रतिशत की संवैधानिक सीमा को ध्वस्त कर दिया। इसके साथ ही मेडिकल दाखिलों (नीट) में 27 प्रतिशत ओबीसी कोटा लागू किया गया और रोहिणी आयोग के जरिए ओबीसी के उप-वर्गीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई।

इसके बावजूद, देशव्यापी जातिगत जनगणना की मांग पर केंद्र सरकार के लगातार असमंजस और टालमटोल ने बहुजन और पिछड़े वर्गों में यह संदेह गहरा किया कि सत्ता तंत्र वास्तविक संख्याबल और संसाधनों के समानुपातिक वितरण से जुड़े यथार्थ को सामने लाने से कतरा रहा है।

 


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