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जब मुद्रा हथियार बन जाए: डॉलर की ताकत के बीच भारत का रुपया कितना सुरक्षित?

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  • दुनिया के 89.2% विदेशी मुद्रा कारोबार में डॉलर की मौजूदगी

  • रूस के 285 अरब डॉलर के रिजर्व फ्रीज होने से बदली वित्तीय जंग की तस्वीर

  • भारत के लिए 88.2% तेल आयात निर्भरता सबसे बड़ा जोखिम

✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई | किसी देश पर हमला करने के लिए अब सिर्फ मिसाइलों की जरूरत नहीं। उसकी बैंकिंग व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली से काटना, विदेशी मुद्रा भंडार रोकना, संपत्तियां फ्रीज करना या डॉलर आधारित लेनदेन की पहुंच सीमित करना भी आर्थिक दबाव का शक्तिशाली हथियार बन चुका है। रूस के केंद्रीय बैंक की 285 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा संपत्तियों का EU और G7 देशों में इमोबिलाइज्ड होना इस बदलती वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का बड़ा उदाहरण है। इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में डॉलर है, जबकि यूरो और पाउंड भी पश्चिमी वित्तीय नेटवर्क को ताकत देते हैं। भारत के लिए सवाल इसलिए सीधा है- अगर मुद्रा और भुगतान नेटवर्क भू-राजनीतिक हथियार बन रहे हैं, तो 88.2% कच्चे तेल की आयात निर्भरता वाले भारत का रुपया कितना सुरक्षित है?

डॉलर की ताकत का पैमाना उसकी वैश्विक पहुंच है। BIS के अप्रैल 2025 के सर्वे के मुताबिक दुनिया के 89.2% विदेशी मुद्रा कारोबार में डॉलर एक मजबूत पक्ष के रूप में उभरा था। यूरो 28.9% और ब्रिटिश पाउंड 10.2% कारोबार में शामिल रहे।

ग्लोबल फॉरेक्स एक्सचेंज मार्केट का औसत दैनिक कारोबार 9.6 लाख करोड़ डॉलर रहा। यानी डॉलर सिर्फ अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मुद्रा नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय बाजार की केंद्रीय धुरी है।

विदेशी मुद्रा भंडार में भी डॉलर का दबदबा कायम है। IMF के 2026 की पहली तिमाही के COFER आंकड़ों के अनुसार वैश्विक आधिकारिक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी 57.13% रही। कुल वैश्विक रिजर्व करीब 13.10 लाख करोड़ डॉलर था। डॉलर की यह स्थिति बताती है कि केंद्रीय बैंक और वैश्विक वित्तीय संस्थान अभी भी अमेरिकी मुद्रा और उसके वित्तीय बाजारों से गहराई से जुड़े हैं।

रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों ने इस वित्तीय शक्ति का व्यावहारिक रूप दिखाया है। UK पार्लियामेंट की रिसर्च के मुताबिक अमेरिका, ब्रिटेन और EU के प्रतिबंधों ने रूस की कम-से-कम 450 अरब डॉलर की वित्तीय पहुंच को प्रभावित किया है, जिसमें रूसी केंद्रीय बैंक के 285 अरब डॉलर के इमोबिलाइज्ड विदेशी मुद्रा भंडार शामिल हैं। जुलाई 2026 में EU ने रूस के खिलाफ 21वें प्रतिबंध पैकेज में वित्तीय और बैंकिंग क्षेत्र के साथ ऊर्जा तथा क्रिप्टो सेवाओं पर भी नए प्रतिबंध लगाए।

भारत के लिए सबसे बड़ा संवेदनशील मोर्चा तेल और डॉलर का दोहरा दबाव है। PPAC के आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में भारत की कच्चे तेल की आयात निर्भरता 88.2% रही। अंतरराष्ट्रीय तेल कारोबार में डॉलर की प्रमुख भूमिका के कारण कच्चा तेल महंगा होने और डॉलर मजबूत होने की स्थिति में भारत का आयात बिल रुपये में और तेजी से बढ़ता है।

सितंबर के आखिरी दिनों में यही दबाव बाजार में दिखाई दिया। Brent 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहा और रुपया 96 प्रति डॉलर के आसपास पहुंच गया। 30 सितंबर को रुपया ₹95.97 प्रति डॉलर पर था। Reuters के मुताबिक विदेशी पूंजी की निकासी और डॉलर की मांग के दबाव के बीच सरकारी बैंकों की डॉलर बिक्री ने रुपये को सहारा दिया। सितंबर में रुपया करीब 0.8% कमजोर होने की स्थिति में था।

इसी जोखिम को कम करने के लिए भारत डॉलर को हटाने के बजाय भुगतान व्यवस्था में विविधता बढ़ा रहा है। RBI की स्पेशल रुपी वोस्टरो अकाउंट व्यवस्था विदेशी बैंकों के साथ रुपये में व्यापारिक भुगतान और निपटान की अनुमति देती है। भारत ने UAE, इंडोनेशिया, मालदीव और मॉरीशस के साथ स्थानीय मुद्रा निपटान की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं।
भारत-रूस व्यापार इसका सबसे ठोस उदाहरण है। सितंबर 2026 में दोनों देशों के बीच 96% द्विपक्षीय व्यापार रुपये और रूबल में निपटाया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार 2024 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड करीब 70 अरब डॉलर तक पहुंचा था।

तेल भुगतान से लेकर विदेशी निवेश और बैंकिंग चैनलों तक, भारत के लिए चुनौती डॉलर को हटाना नहीं, बल्कि किसी एक मुद्रा और वित्तीय नेटवर्क पर अत्यधिक निर्भरता का जोखिम घटाना है। रुपये का अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल बढ़ाना इसी बदलती वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक रास्ता बन रहा है।


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