इलेक्ट्रॉनिक्स में विदेशी चिप्स ने बढ़ाई खाई
चालू वित्त वर्ष में $60 अरब के पार जा सकता है घाटा
भारत में $100 के फोन निर्यात पर $82 के पार्ट्स अब भी आयातित
✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई/नई दिल्ली| वैश्विक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सुपरकंप्यूटिंग क्रांति के दौर में जहां पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाएं सेमीकंडक्टर और हाई-एंड सर्वर निर्यात कर विदेशी मुद्रा के रिकॉर्ड भंडार खड़े कर रही हैं, वहीं विनिर्माण महाशक्ति बनने के दावों के बीच भारत केवल दूसरे देशों से आए कलपुर्जों को पैक करने तक सीमित है।
वाणिज्य मंत्रालय और नीति आयोग के आधिकारिक व्यापार विश्लेषण के अनुसार, मोबाइल निर्यात के नए रिकॉर्ड्स के बावजूद देश में हाई-टेक कंपोनेंट्स की आयात निर्भरता कम नहीं हो रही है। चालू वित्त वर्ष में इलेक्ट्रॉनिक्स आयात का बिल लगातार बढ़ते हुए 100 अरब डॉलर के पार बना हुआ है, जिसके चलते देश का सालाना इलेक्ट्रॉनिक्स व्यापार घाटा लगभग 58 से 60 अरब डॉलर के चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है।
चालू वित्त वर्ष के पहले पांच महीनों में भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 39.4 प्रतिशत की उछाल के साथ 26.66 अरब डॉलर दर्ज किया गया, लेकिन इस आंकड़े की अंदरूनी हकीकत यह है कि इसमें 15.96 अरब डॉलर यानी लगभग 60 प्रतिशत हिस्सेदारी केवल स्मार्टफोन के अंतिम चरण के काम की है।
नीति आयोग के आधिकारिक अध्ययन के अनुसार, इन स्मार्टफोन्स का सबसे अहम और महंगा घटक यानी इंटीग्रेटेड सर्किट और सिलिकॉन चिप्स घरेलू स्तर पर तैयार नहीं हो रहे हैं। देश हर साल लगभग 24 अरब डॉलर यानी करीब दो लाख करोड़ रुपये केवल विदेशी चिप्स आयात करने पर खर्च कर रहा है।
वैश्विक एआई हार्डवेयर मांग का सबसे बड़ा लाभ ताइवान और दक्षिण कोरिया को मिला है। दक्षिण कोरिया के व्यापार मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, अकेले सितंबर महीने में देश का सेमीकंडक्टर निर्यात 262.8 प्रतिशत की ऐतिहासिक छलांग लगाकर 60.3 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जिसके दम पर नौ महीनों में कोरिया का कुल निर्यात 814.5 अरब डॉलर पार कर चुका है।
इसी तरह ताइवान का विनिर्माण पीएमआई 56.7 दर्ज हुआ, जहां एआई सर्वर और चिप्स की मांग के चलते नए निर्यात ऑर्डर साढ़े 15 साल के उच्चतम स्तर पर हैं। इसके मुकाबले भारत में उत्पादन की हलचल तो बढ़ी है, लेकिन वैश्विक वैल्यू-चेन में देश की हिस्सेदारी सबसे निचले स्तर पर बनी हुई है।
नीति आयोग ने आगाह किया है कि भारी-भरकम सब्सिडी वाली उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के तहत 69,548 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों के बावजूद देश में नेट वैल्यू-एडिशन 15 से 18 प्रतिशत की सीमा पार नहीं कर पा रहा है।
जमीनी हकीकत यह है कि भारत यदि 100 डॉलर का फोन निर्यात करता है, तो उसमें लगभग 82 डॉलर के कलपुर्जे – जिनमें डिस्प्ले, प्रोसेसर, कैमरा सेंसर और मेमोरी शामिल हैं- चीन, दक्षिण कोरिया और ताइवान से मंगाए जाते हैं। आयातित सिलिकॉन पर टिकी यह व्यवस्था देश को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय विदेशी हाई-टेक सप्लायर्स पर भारत की निर्भरता को और बढ़ा रही है।
