चीन को टैरिफ राहत, भारत पर 100% तक शुल्क का खतरा
कृषि से खिलौने और कॉफी मेकर तक राहत का प्रस्ताव दोनों देश करीब 30-30 अरब डॉलर के गैर-संवेदनशील सामान पर शुल्क घटाएंगे
वॉशिंगटन-बीजिंग ने व्यापार संघर्षविराम 10 जनवरी तक बढ़ाया, वहीं रूसी तेल खरीद को लेकर भारत पर अमेरिकी टैरिफ का कानूनी रास्ता खुला
✍️ विशेष अंतरराष्ट्रीय डेस्क, वॉशिंगटन/बीजिंग | अमेरिका और चीन के बीच महीनों से चल रही टैरिफ जंग में फिलहाल नरमी का रास्ता खुला है, लेकिन इसी समय भारत के सामने अमेरिकी बाजार में शुल्क का बड़ा जोखिम खड़ा हो गया है। अमेरिका और चीन ने एक-दूसरे से आयात होने वाले करीब 60 अरब डॉलर के गैर-संवेदनशील सामान पर टैरिफ घटाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। दोनों देश करीब 30-30 अरब डॉलर के उत्पादों को कम शुल्क वाली सूची में रखने पर सहमत हुए हैं। दूसरी ओर, रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की अमेरिकी कानूनी शक्ति अब प्रभावी हो चुकी है, जिससे भारत भी संभावित दायरे में है। हालांकि भारत पर 100% अतिरिक्त टैरिफ अभी लागू होने की घोषणा नहीं हुई है।
अमेरिका-चीन की प्रस्तावित राहत में चीन से अमेरिका जाने वाले खिलौने, बच्चों की साइकिल, कॉफी मेकर, टोस्टर, टेबलवेयर, कंबल, बेड लिनेन, कृत्रिम फूल, त्योहारों की सजावट और बच्चों की कार सीट जैसे सामान शामिल हैं। दूसरी ओर चीन अमेरिका से आने वाले मक्का, गेहूं, ज्वार, मांस, डेयरी उत्पाद, वनस्पति तेल, मछली और समुद्री खाद्य, लकड़ी, कॉस्मेटिक्स और मेडिकल उपकरणों पर शुल्क घटाने की तैयारी कर रहा है। हालांकि अमेरिकी कृषि क्षेत्र की सबसे बड़ी चिंता बने सोयाबीन को चीन की टैरिफ कटौती सूची से बाहर रखा गया है।
यह राहत अभी पूरी तरह लागू नहीं हुई है। दोनों सरकारों ने टैरिफ कटौती की वास्तविक दर और लागू होने की तारीख स्पष्ट नहीं की है। साथ ही अमेरिका और चीन ने मौजूदा व्यापार संघर्षविराम को 10 जनवरी तक दो महीने के लिए बढ़ा दिया है, ताकि बाजार पहुंच, निवेश और व्यापारिक बाधाओं पर बातचीत जारी रह सके। दोनों देशों ने 2027 और 2028 में चीन द्वारा हर साल करीब 1 करोड़ टन अमेरिकी कोयला खरीदने पर भी सहमति जताई है।
टैरिफ नरमी का दायरा सिर्फ सामान तक सीमित नहीं है। दोनों देशों ने AI से जुड़े जोखिमों पर संपर्क चैनल, नवंबर के अंत तक अगली AI वार्ता, अमेरिकी वित्तीय संस्थानों के चीन में कारोबार और शाखाएं खोलने की प्रक्रिया तथा दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों को बढ़ाने पर बातचीत जारी रखने का फैसला किया है। यानी व्यापार तनाव कम करने के साथ वित्त, तकनीक और निवेश के रास्ते भी खुले रखने की कोशिश की जा रही है।
चीन को राहत, भारत के सामने दोहरी चुनौती
भारत के लिए अमेरिका-चीन की यह टैरिफ नरमी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिकी बाजार में भारतीय और चीनी उत्पादों की प्रतिस्पर्धा का समीकरण बदल सकता है। यदि चीन के खिलौने, घरेलू उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य उपभोक्ता उत्पाद अमेरिकी बाजार में कम शुल्क के साथ पहुंचते हैं, तो इन क्षेत्रों में भारतीय निर्यातकों को मिलने वाला संभावित शुल्क लाभ कम हो सकता है। हालांकि वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम टैरिफ दरें और उत्पाद सूची क्या रहती है।
भारत की दूसरी और अधिक सीधी चुनौती रूसी तेल से जुड़ी है। अमेरिका ने हाल ही में ऐसे कानून को मंजूरी दी है जिसके तहत राष्ट्रपति को रूस से तेल या गैस खरीदने वाले बड़े आयातकों के खिलाफ 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की शक्ति मिलती है। सूत्रों के अनुसार भारत के रूसी कच्चे तेल आयात में अगस्त में 16.5% की गिरावट आई और सितंबर में इसके और घटने का अनुमान है, क्योंकि भारतीय रिफाइनर वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत तलाश रहे हैं।
यानी एक तरफ वॉशिंगटन और बीजिंग अपने व्यापारिक टकराव में सीमित राहत के रास्ते तलाश रहे हैं, तो दूसरी तरफ भारत को अमेरिकी बाजार में संभावित ऊंचे शुल्क और रूसी तेल खरीद के बीच संतुलन साधना पड़ रहा है। इसका असर केवल भारत-अमेरिका व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा; भारतीय निर्यातकों की अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा आयात लागत और रूस से कच्चे तेल की खरीद तीनों पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।
इसी बीच केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल 29 सितंबर से 5 अक्टूबर तक अमेरिका की यात्रा पर जा रहे हैं। उनकी यात्रा में G20 व्यापार मंत्रियों की बैठक के साथ अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीयर के साथ भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते और प्रस्तावित अंतरिम समझौते पर बातचीत शामिल है।
अमेरिका-चीन टैरिफ समझौते की वास्तविक दर और समयसीमा अभी स्पष्ट नहीं है, जबकि भारत के मामले में 100% तक अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ का कानूनी विकल्प मौजूद है। ऐसे में अगले दौर की भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार की शुल्क व्यवस्था और रूस से ऊर्जा आयात दोनों अहम मुद्दे बने रहेंगे।
